Friday, April 1, 2016

(30) "कविता"

किस रँग की मसि करूँ,
किस रँग से कहूँ कविता,
किस रँग में मैं हँसूं हँसी,
किस रँग में ख़ुशी मना लूँ,

किस रँग में समा जाऊँ मैं,
किस रँग में तुझे भिगो दूँ,
किस रँग का है तुझको यकीं,
किस रँग का विश्वास दिला दूँ,

किस रँग में ख़ुद को डुबा दूँ,
किस रँग में आनंद बसा दूँ,
किस रँग को धुएँ में उड़ा दूँ,
किस रँग में खो जाऊँ सदा।
- अनामिका

Thursday, March 31, 2016

"सैलानी परिंदे"

लंबी दूरी की यात्रा पर निकलने से पहले सैलानी परिंदे क्या-क्या तैयारी करते हैं एक बानगी:-
1. आकाश में सूरज व तारों की स्थिति देखकर सही वक़्त चुनते हैं।
2. धरती के चुम्बकीय क्षेत्र से सही दिशा का निर्धारण करते हैं।
3. पुराने पँख गिरा देते हैं, नए पँखों के आने का इंतज़ार करते हैं।
4. ख़ुराक बढ़ा देते हैं ताकि यात्रा के दौरान कम भोजन से भी काम चल सके।
5. हवा की धारा की दिशा में उड़ते हैं ताकि डैनों का कम इस्तेमाल करना पड़े।
6. अँग्रेज़ी के V आकार के समूह में उड़ते हैं। अगले सिरे पर उड़ने वाले पर सबसे अधिक बल लगता है, अतः उसका स्थान बारी-बारी से दूसरे पक्षी ले लेते हैं। (संगठन में शक्ति है)
7. प्रवास के दौरान प्रजनन नहीं करते। ☺
[सुर्खाब चकवा (ब्राह्मणी डक), लालसर (रेड क्रेस्टेड पोचार्ड), साइबेरियन क्रेन]
(कक्षा 6 की हिंदी की पुस्तक के पाठ पर आधारित)
मेरे द्वारा बच्चे को हिंदी भाषा से परिचित रखने के प्रयास

(29) "आचमन करूँ"

सुमनों से सुरभित शाम लिखूँ,
या सुरमई सी एक रात लिखूँ,

मन उपवन का आनंद लिखूँ,
या तारों भरा आकाश लिखूँ,

सुरों से सजीला राग लिखूँ,
या कोई फागुनी फाग लिखूँ,

रंगों का कारोबार करूँ,
या तुम्हें गुलाल से लाल करूँ,

धानी रंग की मैं चूनर ओढूँ,
या रंग बसंती में तुम्हें ढ़कूँ,

बादामी रंग की लहर बनूँ,
या रुपहली सी चमकार बनूँ,

बैंगनी रंग का वृक्ष बनूँ,
या अँगूरी रंग की लता बनूँ,

नारंगी या लाल पलाश बनूँ,
या थोड़ा सा सुनहरा उठा लूँ,

हिमसागर सा हल्का नील बनूँ,
या जग सरिता सी मलीन दिखूँ,

(ईश्वर मेरे)
सब रंग तुमसे ही छीनूँ,
इन रंगों से आचमन करूँ।








Saturday, March 19, 2016

(3E) "Little delight"

When will be the end of sleepless night,
When will I see the stars so bright,

When will there be the end of my plight,
When will my heart feel really light,

When will there be the end of this slight,
When will I catch the important flight,

When will I see the brightness of sight,
When will you know that I am of might,

When will you understand I was also right,
When will somehow you get that insight,

When will I could get a little delight,
When will you know that I am alright.

Wednesday, March 16, 2016

"प्रेम के बारे में" (5)

आप उम्रदराज़ हो चुके हैं और आप समझते हैं कि प्रेम के बारे में आप सबकुछ जानते हैं। क्या आपको लगता है कि प्रेम ज्ञान का विषय है और आप इसे उम्र के साथ सीखेंगे, क्योंकि ज्ञान तो अनुभवजन्य है ? क्या आपको लगता है कि यह सही दृष्टिकोण है ?
शायद नहीं।
प्रेम इन्द्रियजन्य ज्ञान का विषय नहीं है अतः आप इसे समझने में चूक जाते हैं, सारी उम्र लगे रहते हैं इसकी ख़ोज में फ़िर भी हाथ ख़ाली रह जाते हैं। क्यों होता है ऐसा?
कुछ रिश्तों में आप अपना समय, पूँजी और भावनायें सब तिरोहित कर देते हैं परंतु अंत समय में उन रिश्तों से जो आपकी अपेक्षायें थीं वह पूरी नहीं होतीं हैं और आप इस दुनिया से अतृप्त चले जाते हैं। आप जानते हैं कि मैं ग़लत नहीं कह रही हूँ।
यहाँ आप मर्म समझ गये होंगे, कि जो प्रेम अपेक्षा के साथ होगा वह दुःख का कारण अवश्य बनेगा।
प्रेम में आपकी अपेक्षा होती है कि कोई आपको प्रेम करे, यह चाहना ही कष्ट का कारण है। आप अपनी स्वयं की प्रेम कर सकने की क्षमता से कितने परिचित हैं ? परिचित हैं भी या नहीं ? कहीं आप सौदेबाज़ी तो नहीं कर रहे हैं, कि तुम फलाँ तरह से बर्ताव करोगे/करोगी तब ही प्रेम होगा नहीं तो नहीं। यह तो किसी तरह से प्रेम नहीं है। यह आपके मन में बसा हुआ वह काल्पनिक स्वरुप है जिसे आप कल्पना में ही प्रेम कर रहे हैं और उसे वास्तविकता में देखना चाहते हैं। जबकि वास्तविकता तो वास्तविकता होती है।
- अनामिका

Wednesday, March 9, 2016

(28) "पता नहीं क्यूँ डरती हूँ।"

स्नेह नहीं लगता है कोमल,
आँसू भी हैं कम ख़ारे,
नेह अब छलकता नहीं,
रिक्त हैं यह कुंभ सारे,

सड़ी हुई लकड़ी होती तो,
उग आते कुछ मशरूम,
किल्ले नहीं फ़ूटेंगे इसमें,
जान नहीं है ज़रा बाकी,

मन की अंतहीन गहराइयों में,
लगाती हूँ इक पुकार,
टकराकर आती नहीं वापस,
खो जाती है वहीं कहीं,

पल-पल बदलते हालातों से,
सिमटते जज़्बातों से,
बढ़ते हुये फ़ासलों से,
ख़ुद के मिट जाने से,
पता नहीं क्यूँ डरती हूँ।
- अनामिका

Monday, February 29, 2016

"जीवन की गति"

अपने चारों ओर नज़र दौड़ाइये और आप पायेंगे कि जीवन की एक विशेष गति होती है। हर शहर, हर गाँव, हर देश की एक ख़ास गति। हम उस प्रवाह से अलग़ नहीं हैं। क्योंकि हम उस प्रवाह से अलग़ नहीं हैं, अतः जिस समय, स्थान और काल में हम उपस्थित हैं वहाँ हमारी अनुपस्थिति से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता है। जो लोग आज आपके जीवन में हैं, जब वे नहीं थे तब भी आपका जीवन चल रहा था, जब वे नहीं होंगे तब भी आपका जीवन (यदि बाकी है तो) चलेगा। यही बात दूसरों पर भी लागू होती है, आप नहीं होंगे तब भी जीवन चलेगा, अपनी विशेष गति से। आपके पास अपने कर्मों का निर्वाह करते चले जाने के अतिरिक्त विशेष कोई अधिकार नहीं है। जो व्यक्ति इस सत्य से साक्षात्कार कर लेते हैं उनके लिये जीवन थोड़ा आसान हो जाता है।
अपने किये गये कर्मों पर भरोसा रखिये, प्रतिफल अवश्यम्भावी है, न रत्तीभर भी कम न ज़्यादा। धैर्य के साथ समय की प्रतीक्षा कीजिये।

Friday, February 26, 2016

(27) "औरतें"

बहुत-बहुत दिनों के बाद मिल पाती हैं औरतें,
घरभर के काम-काज में उलझी रहती हैं औरतें,

प्रेम का हक़ भले न हो कर्तव्य पर निभाती हैं औरतें,
जाने क्या बँधन होता है जिसे हर हाल संवारती हैं औरतें,

आजकल दिल अपना कम ही खोलती हैं औरतें,
आँखों ही आँखों में बहुत कुछ कह जाती हैं औरतें,

बेटियों को गणित और विज्ञान में उलझाती हैं औरतें,
अपने सपनों को बच्चों की आँखों में सजाती हैं औरतें,

कितना कुछ सहती हैं फ़िर भी कम कहती हैं औरतें,
दिल में ज़ब्त करके बहुत मुस्कान बिखेरती हैं औरतें,

कभी वामपंथ तो कभी दक्षिणपंथ को गरियाती हैं औरतें,
अपने हालात में रत्तीभर भी बदलाव न कर पाती हैं औरतें,

कभी साड़ी-लहँगे, कभी जीन्स में टिकाई जाती हैं औरतें,
वक़्त, माहौल, देश, धर्म के अनुसार बदलाई जाती हैं औरतें,

कभी मोहरा, कभी देवी, कभी वेश्या बना दी जाती हैं औरतें,
सह-देख-सुन कर, तमाशा दुनिया का, चली जाती हैं औरतें।

(26) "गुंजाइश"

रिश्तों में भरम बना रहने दे,
ज़रा सी गुंजाइश बनी रहने दे,

रस्ते तो सबके कट ही जायेंगे,
ज़रा ये विश्वास बना रहने दे,

मन का मिलना न मिलना सही,
दुआ-सलाम तो ज़ारी रहने दे,

ज़िन्दगी पूछेगी सवाल आख़री,
कुछ बदी नेकी में तब्दील होने दे,

सब हैं परिंदे परदेशी, पर न क़तर,
आज यहाँ और कल वहाँ उड़ने दे,

पानी का बुलबुला है ज़िन्दगी,
कुछ अपन सुना, कुछ मुझे कहने दे।

Tuesday, February 23, 2016

"प्रेम के बारे में" (4)

प्रेम और उसका प्रदर्शन....
प्रश्न उठता है कई बार, कई-कई बार, कि क्या "प्रेम में प्रदर्शन" आवश्यक है? क्या "प्रेम का प्रदर्शन" आवश्यक है?
हाँ, आवश्यक है।
प्रेम का प्रदर्शन आवश्यक है, उससे, जिससे प्रेम है। प्रेम का प्रदर्शन दुनिया के लिये क्यूँ हो? दुनिया को क्या मतलब कि आप प्रेम में हैं या नहीं? यदि आप प्रेम में हैं तब तो यह स्वतः प्रकट है, प्रेम में होने के भौंडे प्रदर्शन की आवश्यकता क्या है?
क्या आप नहीं चाहते कि जो आपसे प्रेम करे वो जता भी दे।
कई बार लोग कहते पाये जाते हैं कि हम कोई "माइंड रीडर" थोड़े ही हैं जो बिना कहे समझ जायें। सही भी है, बिना कहे कोई कैसे जाने।
आमतौर पर कहा जाता है कि पहेलियाँ बुझाना अधिक लोगों को पसंद नहीं होता, जो बात है वो सीधे तौर पर कही जानी चाहिये, है कि नहीं!!!
लेकिन प्रेम का मामला तो बड़ा टेढ़ा है, सीधे कैसे कह दिया जाये, समझने की बात है, अब समझा कैसे जाये। बहुत चक्कर है।
प्रेम के सार्वजनिक प्रदर्शन का जग दीवाना हुआ लगता है, अतः प्रेम में होना आवश्यक नहीं रह गया, उसका प्रदर्शन ही आवश्यक है शायद।

"प्रेम के बारे में" (3)

प्रेम के बारे में अक्सर लोग भ्रान्ति का शिकार होते हैं।

कुछ लोग हीन भावना से ग्रस्त होते हैं और अक्सर यह कहते पाये जाते हैं कि मुझसे कौन प्यार करेगा, मुझसे कोई क्यूँ प्यार करेगा, मुझमें ऐसा क्या है कि कोई प्यार करे। ऐसे लोगों को कभी अपने रूप-रंग पर शक़ होता है, कभी अपनी योग्यता पर, और प्यार किये जाने को एहसान तक मान लेते हैं।
वो गाना सुना है ना "मैंने प्यार किया" का..
"तुम मान इतना जो दे रहे हो, मुझ पे ये एहसान है"
गीत के ये बोल कहाँ से आ गये...कहीं न कहीं हीन भावना समाज में व्याप्त है, जिसका लोग अलग़-अलग़ तरह से फ़ायदा उठाते हैं। ऐसे लोगों को प्यार मिल जाता है तो वो अभिभूत हो जाते हैं।

अब दूसरी तरह के लोगों की बात करते हैं, जो ये समझते हैं कि प्यार उनका अधिकार है। ऐसे लोग बहुत भाग्यशाली होते हैं क्योंकि बचपन से उन्हें माता-पिता, अध्यापकों, परिजनों और मित्र-सखाओं का स्नेह व प्यार मिलता रहता है। इस प्रकार की परिस्थितियों में बड़े होने पर वह हमेशा समझते हैं कि यह परिवेश सदा बना रहेगा, पर ऐसा होता नहीं है। पहला झटका ही काफ़ी होता है इनके लिये। छोटी सी भी अस्वीकार्यता उनसे सहन नहीं होती है।

इन दोनों ही स्थितियों में एक बात समान है, दोनों ही प्रकार के लोग स्वयं की प्रेम करने की क्षमता से अनभिज्ञ होते हैं। हीनभावना से ग्रस्त लोग यह नहीं जानते कि वो प्रेम में किस सीमा तक जा सकते हैं, बशर्ते कि वो अपनी इस क्षमता से परिचित हों। अहंकार से ग्रस्त लोग हमेशा समझते हैं कि प्रेम उन्हें हमेशा प्रदत्त होगा, वो कभी जान ही नहीं पाते हैं कि वो स्वयं किस सीमा तक प्रेम कर सकते हैं। दोनों ही बेचारे ग़रीब होते हैं, कभी-कभी ऐसे ही इस जीवन को त्याग चले भी जाते हैं।

"भारत की सेना और मेरी भावनायें" (संस्मरण)

1996-97 की बात है, उन दिनों अख़बारों में भारतीय वायु सेना में भर्ती के लिये एक विज्ञापन निकला करता था, "क्या आप में है वो बात? (ऐसा ही कुछ)"। "ग्राउंड ड्यूटी ऑफिसर्स" के लिये अविवाहित युवक/युवतियों से आवेदन माँगे गये थे। ग्रेजुएशन में गणित/भौतिकी/रसायन आदि विषयों के प्राप्तांकों के आधार पर चयन के लिये बुलावा पत्र आ सकता था। मैंने भी अप्लाई करने का निर्णय लिया, बुलावे के आ जाने जैसी कोई उम्मीद नहीं थी। आवेदन करने के लिये कोई फ़ीस भी नहीं माँगी गयी थी। आवेदन सादे कागज़ पर हाथ से बनाकर या टाइप्ड प्रति में किया जा सकता था। मैंने एक A4 साइज़ के कागज़ पर हाथ से कॉलम etc. बनाकर आवेदन कर दिया, बस अपने गणित के प्राप्तांकों का भरोसा था जोकि मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा थे, बस यही एक तिनका था। तब मेरा व्यक्तित्व बहुत ही अंतर्मुखी किस्म का था, NCC जैसा भी कभी कुछ किया नहीं था, स्कूल में ज़रूर "स्काउट/गाइड" का थोड़ा प्रशिक्षण मिला था।
ख़ैर आवेदन-पत्र भेज दिया।
उम्मीद के विपरीत बुलावा आ गया, देहरादून के 1AFSB से। आने-जाने का स्लीपर क्लास का किराया और रहने-खाने का इंतज़ाम, यहाँ तक कि रेलवे स्टेशन से सेंटर तक लाने-छोड़ने का भी इन्तज़ाम।
मैं बार-बार बुलावा-पत्र को देखती और इतना खुश होती कि जैसे कोई लॉटरी लग गयी हो।
अब समस्या ये कि मैं परीक्षा देने जाऊँ कैसे?
लेकिन, ज़िद्द थी कि जाना है। वाक़ई, आज मुझे बिल्कुल भी अफ़सोस नहीं है उस दिन के ज़िद्दीपने का। यदि मैं ना गयी होती तो, मैं मेरे आज के अपने होने को सिद्ध न कर पाती। उस परीक्षा ने मेरी आँखें खोल दीं।
मम्मी-पापा को मनाया और देहरादून की यात्रा पर अकेले निकल पड़ी (बाद में कितनी यात्रायें अकेले कीं, पर यह ख़ास है)। एक लड़की जो कभी शहर से बाहर भी अकेले न गयी हो, जिसकी ज़िन्दगी क़िताबों से माथापच्ची में बीती हो, घर के सुरक्षित वातावरण से निकल कर अकेले यात्रा करना उसके लिये सज़ा से कम नहीं था। लेकिन क़माल का विश्वास था मम्मी-पापा को मुझपर, क्यों, ये तो मैं भी नहीं जानती। मम्मी ने कुछ हिदायतें दे कर मेरा हौसला बढ़ा दिया था, और मैं उनसे कह रही थी कि देखना, कल की लौटती गाड़ी से ही वापस आ जाऊँगी।
देहरादून में सब उसी प्रकार हुआ जैसा पत्र में बताया गया था। पूरे भारत से 72 लडकियों को बुलाया गया था, ये था मेरा भारत के हर प्रांत की लड़की से मिलने का पहला अनुभव। हमें रहने आदि के नियम-क़ायदे बता दिये गये। हमें "चेस्ट नंबर" दे दिये गये, अब नंबर ही हमारी पहचान थे, शाम को घर पर फ़ोन करके सूचना देने की अनुमति दी गयी, रात 10:00 बजे के बाद जागने की सख़्त मनाही थी, सुबह नाश्ता वग़ैरह कर के 7:00 बजे रिपोर्ट करना था। दूसरे दिन सुबह ही लोगों का एक "स्क्रीन टेस्ट" हुआ। स्क्रीन टेस्ट में कुछ साइकोलॉजी के टेस्ट, कुछ रीजनिंग इत्यादि के प्रश्न थे।
टेस्ट के बाद हम सबको फ़िर से इकठ्ठा किया गया। अब एनाउन्समेंट होनी थी कि कितने लोगों को आगे के टेस्ट के लिये रुकना है और कितने लोग घर वापस जायेंगे। अभी तक कानपुर की तीन लड़कियाँ थीं।
एनाउंसमेंट हो गयी और मुझे रोक लिया गया। मन बल्लियों उछलने लगा, एक बार फ़िर फ़तह हो गयी थी।
आगे की परीक्षा में तरह-तरह के टेस्ट थे, जैसे कि, सोलो टॉक, ग्रुप डिस्कशन, ग्रुप टास्क, फिजिकल टास्क (सोलो), फिजिकल टास्क (ग्रुप), केस स्टडी एंड स्ट्रेटेजी बिल्डिंग, साइकोलॉजी टेस्ट और पर्सनल इंटरव्यू। मेरे सामने भाषा (अँग्रेज़ी) की समस्या और तैयारी की कमी दोनों ही थीं। वहाँ जिन 32 लड़कियों को रोका गया था, सब एक से बढ़कर एक थीं, मुझसे कहीं ज़्यादा इंफॉर्मड थीं, मैं कच्ची खिलाड़ी थी। 4 दिन बाद मुझे भी घर जाने के लिये बोल दिया गया।
उस दिन के बाद से अँग्रेज़ी भाषा को काबू करना मेरा पहला लक्ष्य हो गया था, ये कहना ग़लत न होगा कि इस एक अकेली परीक्षा ने जीवन के प्रति मेरे दृष्टिकोण को एक पैराडाइम शिफ़्ट दे दिया था, अब मुझे ये पता चल गया था कि कुछ भी पाने के लिये सिर्फ़ प्रतिभा ही काफ़ी नहीं है, लक्ष्य की दिशा में सधे हुये, सतत प्रयास भी करने होंगे।
प्रयास किये और GRE and TOEFL में जाकर ही गाड़ी रुकी।
जीवन सफ़लता और असफ़लता का मिला-जुला रूप है, आप इसे कैसे देखते हैं बस वही महत्वपूर्ण है।
(जनरल बख़्शी के रोने की ख़बर ने न सिर्फ़ मुझे रुला दिया, बल्कि यादों के उस पाले में ले जाकर खड़ा कर दिया जो देहरादून में है। ये वह समय था जब सिर्फ़ "ग्राउंड ड्यूटी" के लिये ही युवतियों के दरवाज़े खोले गये थे, अब समय बहुत बदल गया है)

Wednesday, February 10, 2016

"प्रेम के बारे में" (2)

परस्पर निर्भरता ही संबंधों का आधार है। प्रेम का इस आदान-प्रदान में कोई योगदान नहीं है। (Relations are purely based on give and take, name any relation existing, existed, will exists).
यदि आप स्वतंत्र जीवन जीने के आदी हैं और स्वतंत्र जीवन ही जीना चाहते हैं तब आपको विवाह जैसे किसी बंधन में नहीं बंधना चाहिये।
हाल ही में एक मूवी देखी, "तमाशा", उसकी कहानी में भी नायक-नायिका यही सोच रखते थे। दोनों आर्थिकरूप से आत्मनिर्भर थे, स्वतंत्र थे, फ़िर वो एक-दूसरे के साथ सम्बंध में भी बंध जाते हैं, लेकिन प्यार तो होता ही नहीं है, या यूँ कहें कि प्यार होता है पर देख नहीं पाते। अपनी-अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह से जीने लगते हैं पर ख़ुश नहीं हैं।
कहाँ है ख़ुशी?
प्यार में है जीवन की ख़ुशी।
अब ये प्यार क्या बला है?
प्यार वो स्वतंत्रता है जो आप ख़ुद के लिये नहीं अपने साथी के लिये तलाशते हैं, और आपका साथी जानता/जानती है कि आप उस पर और उसकी ख़ुद की खोज पर विश्वास करते हैं। जब दोनों एक-दूसरे के लिये यह तलाश करते हैं तब प्यार प्रकट होता है। हो सकता है इस क्रम में आप सबकुछ खो दें।यही प्यार में सबसे बड़ा भय है, खो देने का भय, कभी-कभी ख़ुद को भी और साथी को भी।
"इक आग़ का दरिया है, और डूब के जाना है"

"प्रेम के बारे में" (1)

एक गीत की पंक्तियाँ याद आ गयीं,
"जो मैं ऐसा जानती, कि प्रीत किये दुःख होए,
नगर ढिंढोरा पीटती, कि प्रीत न करियो कोए..."

बहुत दिनों से सोच रही थी कि क्या लिखूँ प्रेम के बारे में, जितने लोग उतनी बातें, उतनी तरह से। हर कोई प्रेम को अपने-अपने हिसाब से परिभाषित करता है।
किसी के लिये प्रेम तपस्या है,
किसी के लिए सारे जीवन की साधना,
किसी के लिये जीवन का सार है,
किसी के लिये जीने का आधार है,
किसी के लिये समर्पण,
किसी के लिये सर्वस्व त्याग है।
न जाने कितने कवि, कितने साहित्यकार प्रेम को परिभाषित कर-कर के सिधार गये, पर ये आज भी एक जटिल पहेली बना हुआ है। नयी पीढ़ी भी इसे उन्हीं पुराने प्रतीकों के माध्यम से परिभाषित करना चाहती है, इसका अर्थ ये लिया जा सकता है कि प्रतीक शाश्वत हैं अतः प्रेम भी शाश्वत ही होगा, यानी कि ये दुनिया कभी प्रेम से खाली न होगी, प्रेम सदा विजयी होगा।

Tuesday, February 2, 2016

"कानपुर स्मार्ट सिटी है"

कानपुर को स्मार्ट सिटीज़ की लिस्ट में नहीं चुना गया इस बात से हम सभी दुःखी भी हुये और क्रोधित भी। कुछ लोगों की प्रतिक्रियायें तो इस प्रकार लगीं जैसे किसी एग्जाम में फ़ेल हो जाने पर घर वाले बच्चे को ही डाँटने-डपटने लगते हैं कि तू है ही नालायक, तेरा कुछ हो ही नहीं सकता (मसलन, कानपुर हमेशा से ही गन्दा है, यहाँ के लोगों में सिविक सेंस नहीं है, आदि आदि)।
क्या आप भी ऐसी ही नकारात्मक सोच रखते हैं? यदि हाँ तो ज़रा ग़ौर फरमाइये:-
1. आज़ादी की लड़ाई की चिंगारी सुलगाने वाला शहर है कानपुर, ये शहर न होता तो आज हमारा संविधान न होता। अँग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ाद हो गये तो क्या गन्दगी और लाचारी दूर न कर सकेंगे?
2. अनेक डॉक्टर, इंजीनियर, IAS, IPS, वक़ील, शिक्षाविद, साहित्यकार, गायक, व्यापारी, उद्यमी, कानपुर से ही निकले हैं और दुनियाभर में छाये हैं। अग़र कानपुर में लाखों बुराइयाँ ही हैं तो यह कैसे संभव हुआ?
3. पूरे उत्तर प्रदेश में महिलाओं की साक्षरता का प्रतिशत भी सबसे अधिक कानपुर में ही है। ~71%, क्या शिक्षित महिलायें सहयोग न करेंगी?
किसी प्रतियोगिता में चयन हो पाना या न हो पाना कई कारणों पर निर्भर हो सकता है परंतु इसका अर्थ यह नहीं है हम सब आत्महीनता की भावना से ग्रस्त हो जायें, और ख़ुद को ही ख़री-खोटी सुनाने लगें।
यदि आपको शहर के प्रशासन व रख-रखाव में अनेक समस्यायें दिखती हैं तो कृपया स्वयं से भी पूछें कि क्या सही जगह सवाल उठाये गये हैं? यदि नहीं, तो क्या अब सवाल नहीं उठाये जाने चाहियें? ख़ुद से भी पूछिये, कितना बदला है ख़ुद को?
क्या बिना सरकारी सहायता के हम स्मार्ट नहीं हो सकते?

"सबसे बड़ा दुःख"

जानते हैं जीवन में सबसे बड़ा दुःख क्या होता है?
जीवन में सबसे बड़ा दुःख है बिछड़ना, बिछुड़ना, विछोह, बिछोह, दूरी। अपने प्रियजनों से दूरी की कल्पना मात्र से ही आप द्रवित हो उठते हैं। यहाँ तक कि कोई अपने प्रियजनों से दूर होने की बात भी आपको बताये तो आप घंटों तक रो सकते हैं, हाल ही में एक मित्र ने 10 वर्ष की आयु में हॉस्टल जाने और माँ से बिछड़ने का ज़िक्र किया और मुझे ख़ूब रुलाया, लेकिन ऐसे में ही आपको कुछ शक्तिशाली और सहनशील प्रियजन भी याद आते हैं जो अपनी भावनाओं को नियंत्रण में रख सकते हैं। कैसे कर पाते हैं वो ऐसा? इसे एक उदाहरण से समझते हैं:-
जब छोटे बच्चे पहली बार स्कूल जाना शुरू करते हैं तो आपसे अलग़ होने से एहसास मात्र से ही वो रोने लगते हैं, ऐसा सिलसिला दो-चार दिन तक चलता है फ़िर सब सामान्य हो जाता है। क्यों? ऐसा इसलिये होता है कि आप जानते हैं कि आप जो कर रहे हैं उसके भले के लिये कर रहे हैं (separation anxiety), :) नहीं।
ऐसा इसलिये होता है क्योंकि आप जानते हैं कि हर व्यक्ति इस जगत में एक यात्री है, फ़िर चाहे वह आपका पुत्र या पुत्री हो या मित्र या प्रियजन। आगे की यात्रा उसका विधान है।
जब हम यहाँ (जापान) रहने आये थे हम नहीं जानते थे कि कितने दिन या कितने साल यहाँ रहना है। भाषा भी नहीं जानते थे। किसी से भावनात्मक सम्बन्ध बनेंगे इसकी आशा भी न की थी और आवश्यकता भी नहीं लगी। लेकिन फ़िर भी लोगों से मिलना-जुलना हुआ और जुड़ाव भी हो गया, अब यह जुड़ाव ही तो आधार है ना। मेरे इस ज़िक्र भर से ही कि मैं वापस चली जाऊँगी, मेरी सहेलियों की आँखें भर आती हैं। ऐसे में, मैं ख़ुद को बहुत विचित्र स्थिति में पाती हूँ, क्योंकि इस विछोह की पीड़ा के कारण को समझ जाने के कारण मैं दुःखी नहीं हो पाती हूँ। हम यात्री हैं और साथ होने का यही परिणाम है।
यह हम सभी समझते हैं कि भौगोलिकरूप से दूर हो जाने पर कई सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं, कई सम्बन्ध सुप्त हो जाते हैं, और कई सम्बन्ध बने रहते हैं। अतः कौन सा सम्बन्ध किन नयी ऊँचाइयों को छुऐगा, कौन सा सम्बन्ध दुःख का कारण बनेगा, यह पहले से कहा नहीं जा सकता। कोशिश कीजिये कि जिससे भी मिलिये प्रेमपूर्वक मिलिये। लोग आपको भूल जायेंगे, पर आपके व्यवहार को कभी नहीं भूलेंगे (व्यवहार की कई गलतियाँ मुझसे हो चुकी हैं)।

Friday, January 29, 2016

श्री पारीक जी की सलाह पर घरेलू कचरे के प्रबंधन से सम्बंधित कुछ अनुभव साझा कर रही हूँ:-
ये कुछ आसान उपाय हैं जिन्हें यदि हम चाहें तो रोज़ाना व्यवहार में ला सकते हैं।
1. कोशिश करें कि पॉलिथीन बैग्स का इस्तेमाल कम से कम करें। अपने हैण्ड बैग में एक फोल्डिंग बैग/कपड़े का बैग साथ रखें, अक्सर बाहर से आते वक़्त हम कुछ न कुछ फल या सब्जियाँ ख़रीद लाते हैं और बैग न होने पर पॉलिथीन बैग का इस्तेमाल कर लेते हैं जोकि बाद में कचरे में ही जाता है।
2. कानपुर परिवर्तन फोरम के लोग कोई चार्ज नहीं लेते हैं गार्बेज कलेक्शन के लिये, मेरे विचार से वो उन घरों से पुराने अख़बार और पेपर वेस्ट को कलेक्ट कर सकते हैं। पुराने अखबार/पेपर वेस्ट लिफ़ाफ़े बनाने के काम में आते हैं या रीयूज़/रीसेल कर सकते हैं।
3. घर में कम से कम 2 डस्टबिन रखें। किचन वेस्ट और एक्स्ट्रा वेस्ट घर से ही सेपरेट हो कर जाये।
4. कानपुर परिवर्तन फोरम में अधिक से अधिक मेंबर्स जोड़े जायें ताकि मेंबर्स तो यह अच्छा कार्य करने में सहयोगी हों।
5. याद रखिये इस काम में सहयोग करके आप वास्तव में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। स्वच्छता हमारे बच्चों के भविष्य लिये अच्छी है। बच्चों को इस प्रक्रिया में सहयोगी बना लीजिये, बच्चे कभी निराश नहीं करते।
(आप सभी के सुझाव आमंत्रित हैं 😊)
Cleanliness Counts
"Waste reduction is the best solution to waste management"
कचरे को कम करने के कुछ उपाय:-
1. प्लास्टिक का इस्तेमाल कम से कम करें।
2. प्लास्टिक के कप या ग्लास में गर्म चीज़ें पीने से कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है। (यदि ये जानकारी ग़लत है तो कृपया संशोधन कर दें)। मिट्टी के कुल्हड़ या सकोरे के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाये।
3. डिस्पोज़ेबल चीज़ों का इस्तेमाल कम से कम करें।
4. प्लास्टिक के बर्तनों में रखकर कभी कोई चीज़ माइक्रोवेव न करें। प्लीज़।
5. सफ़ाई कर्मचारी को भी इंसान ही समझें, उसके लिये काम न बढ़ायें ☺

इस फ़ोरम से जुड़े हुये लोगों में से 100% लोग ये चाहते होंगे कि कानपुर की सड़कें, गलियाँ, पार्क, पब्लिक स्पेस सब एकदम साफ़-सुथरा हो।
1. क्या आप ईमानदारी से जवाब दे सकते हैं कि कितने लोग "अपने घर" की सफ़ाई ख़ुद करते हैं ?
2. आपके घर की सफ़ाई कौन करता है/करती है, और उस सफ़ाई में आपका क्या और कितना योगदान है?
3. इस बात की संभावना अधिक है कि आप शहर के एक बड़े हिस्से में रहते हैं जबकि आपका सफ़ाई कर्मचारी शायद बहुत ही छोटी सी जगह में रहता है, शहर के प्रति उसकी जवाबदेही कम बल्कि आपकी ज़्यादा है।
4. सफ़ाई करने से सफ़ाई नहीं होती, सफ़ाई रखनी पड़ती है। सफ़ाई एक सुविधा नहीं बल्कि ज़रुरत है। सफ़ाई एक आदत है।
5. सफ़ाई का कोई विकल्प नहीं है।
"Change begins at home"

"लड़का होगा या लड़की होगी"

प्रकृति ने मनुष्य को दो रूपों में बनाया है। लड़का या लड़की।
माँ बनने जा रही हर लड़की के मन में यह जानने की उत्सुकता होती है कि उसके गर्भ में पल रही संतान लड़की है या लड़का है। इस विषय पर तीन अलग़-अलग़ देशों के संदर्भ देखते हैं।
1. भारत से सुदूर पश्चिम (अमेरिका):-
यहाँ माता-पिता बनने जा रहे दम्पति को डॉक्टर पहले ही बता देते हैं कि आपके घर बेटी आने वाली है या बेटा। (आज ही अपने एक मित्र दम्पति से हुई बातचीत के आधार पर कह रही हूँ) ये बात वैसे भी अनेक मित्रों के लिये नई नहीं है क्योंकि आपमें से अनेक लोग इस प्रैक्टिस से परिचित हैं।
A) मेरी जिज्ञासा यह है कि जेन्डर डिफरेंस में विश्वास न करने वाला देश इस प्रकार की प्रैक्टिस क्यों करता है?
B) बेटा हो या बेटी हो, यह बात पैदा होने के बाद ही पता चले तो उसके क्या नुकसान हैं, पहले जानकारी होने के क्या फ़ायदे हैं?
2. भारत :-
भारत में लिङ्ग परीक्षण अवैध है। अतः सामान्य तौर पर यह जानकारी सिर्फ़ डॉक्टर को ही होती है कि गर्भ में पल रही संतान लड़की है या लड़का है।
A) मेरी जिज्ञासा है कि भारत के कई परिवारों में आज भी नवजात शिशु के पैदा होने से पूर्व ख़रीदारी करने का रिवाज़ नहीं है। ऐसा करने के पीछे वजहें क्या हैं और ऐसा करने के फ़ायदे क्या हैं?
3. सुदूर पूर्व (जापान):-
जापान भी अमेरिका के नक़्शे-क़दम पर चलता है और यहाँ भी अजन्मे बच्चे का जेंडर बता देते हैं।
इसके फ़ायदे क्या हैं यह तो नहीं जानती, लेकिन एक नुकसान ज़रूर देखा है। दो वर्ष पूर्व एक बांग्लादेशी मित्र थीं यहाँ, एक बच्ची की माँ, दुबारा माँ बनने वाली थीं, मुझे ख़रीदारी करती हुयी मिलीं और मैंने बधाई व भविष्य के लिये शुभकामनायें दीं तो वो उदास हो गयीं कि फ़िर से बेटी है। उस वक़्त मुझे इस प्रकार की पूर्व जानकारी का कोई औचित्य समझ में नहीं आया।
जहाँ तक जापानियों का प्रश्न है, मुझे लगता है कि पूर्व जानकारी से उन्हें कोई ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता है, यहाँ वैसे भी बच्चों की जनसँख्या अनुपात में काफ़ी कम है।

Monday, January 25, 2016

(6) "प्रेम जाल" (कहानी)

सोलह साल की कच्ची उम्र और प्रेम का पहला अहसास होने के बाद सुनैना के लिये दुनिया इससे हसीन कैसे हो सकती थी?

सावली रंगत वाली इस लड़की की बोली-भाषा इतनी मीठी कि कोई भी फ़िदा हो जाये। स्कूल जाने और शहर के अच्छे घरों की लड़कियों के साथ उठने-बैठने से अपनी ग़रीबी का उसे ज़रा भी भान न रहा था। हर लड़की की तरह सजने-संवरने और ढ़ंग से पहनने-ओढ़ने की तरफ़ उसका ख़ास रुझान था।

ग़रीबी तो हर किसी का मज़ाक उड़ाने का अधिकार लेकर ही आती हो जैसे, प्रेम भी इससे अछूता कैसे रह सकता है। अब सुनैना की ज़िन्दगी का मक़सद मनचाही शादी करके घर बसाना ही था बस। लेकिन, घर की बड़ी लड़की होने से और आर्थिक तंगी होने के कारण उसके माता-पिता ने उसे बेबी-सिटिंग के काम के लिये मेरे यहाँ काम पर लगा रखा था। अनुभवी होने के कारण इतना समझने में मुझे देर न लगी कि सुनैना को बच्चे पसंद हैं, मेरे बेटे के साथ जल्दी ही उसकी दोस्ती हो गयी। मैं उससे कहती कि तुम्हें अपनी पढ़ाई जारी रखनी चाहिये, स्कूल से वापस आकर तुम बेबी-सिटिंग कर सकती हो, तुम्हारे स्कूल की फ़ीस भी मैं दे दूँगी। लेकिन अब सुनैना का मन पढ़ाई में नहीं था। उसने पढ़ाई को लेकर बिल्कुल भी उत्साह नहीं दिखाया। ख़ैर, जिंदगी चल पड़ी।

कुछ दिन बाद मुझे जानकारी हुई कि सुनैना मेहँदी की बहुत सुंदर डिज़ाइन बना लेती है। आर्ट और क्राफ़्ट में उसे बहुत रुचि है, बहुत सलीक़े से बना सकती है। मैंने उसे एक ड्रॉइंग कॉपी और मेहँदी की डिज़ाइन वाली क़िताबें उपलब्द्ध करा दीं। अब, उसका बेबी-सिटिंग का समय बोरिंग नहीं था, सुनैना और मेरा बेटा मिलकर ड्रॉइंग, कलरिंग, पेंटिंग, क्राफ़्ट आदि किया करते। शाम होने तक मैं घर आ जाती और उनके बनाये सामानों की तारीफ़ें किया करती। धीरे-धीरे उसे मुझ पर विश्वास हो गया कि मैं वास्तव में उसका भला ही चाहती हूँ।

एक दिन मेरी एक सहृदय पड़ोसन का फ़ोन आया कि आपका बेटा स्कूल से घर आ गया है, लेकिन सुनैना काम पर नहीं आयी है। उसका पता लगाने के बाद पता चला कि कुछ समस्या आ गयी है, अगले दिन भी वह काम पर नहीं आयी। उसके बजाये उसकी माँ आयी और रोते-रोते उसने अपनी आप बीती मुझे कह सुनाई। सुनैना ने हाथ की नस काटकर आत्महत्या करने का प्रयास किया है, डॉक्टर को दिखाकर पट्टी करा दी है, अब शायद ही वह काम पर आये। कारण पूछने पर पता चला कि, रिश्ते के एक लड़के से उसे प्रेम हो गया है और उसी से शादी करना चाहती है। हम अभी इस कम उम्र में उसकी शादी नहीं करना चाहते हैं, लेकिन प्यार ने उसे अँधा बना दिया है, हम सब उसे दुश्मन नज़र आते हैं। मैंने कहा, उसे मेरे पास भेजना, मैं उससे बात करूँगी, और उसे ये मत कहना कि तुमने मुझे उसकी सारी बातें बता दी हैं, मैं उसके मुँह से ही सुनना चाहती हूँ, वो क्या कहती है, क्या सोचती है। दो-चार दिन बाद शाम को सुनैना हाथ में पट्टी बाँधे मेरे पास आयी। मैंने उसे बैठने का इशारा किया और चाय पीते-पीते पूछा (सुनैना चाय नहीं पीती थी), बेटा ये चोट कैसे लगी? उसने झूठ बोलने की कोशिश की, तो मैंने पूछा, सुनैना, क्या तुम सच में उस लड़के से इतना प्यार करती हो कि अपनी जान भी दे सकती हो? वह सिर झुकाए बैठी रही। मैंने दूसरा प्रश्न किया, क्या वह लड़का तुमसे शादी करना चाहता है? उसने हाँ में सिर हिलाकर जवाब दिया। क्या तुम कुछ दिन इंतज़ार कर सकती हो, ताकि कुछ पैसे जोड़ सको? वह चुप रही। हम्म, अच्छा, क्या तुम सिर्फ़ कुछ दिन रुक सकती हो जबतक मैं दूसरी बेबी-सिटर ढूँढ़ लूँ? उसने हाँ में सिर हिलाया। अच्छा तब ठीक है, मैं तुम्हारी माँ से बात करूँगी।

ज़रा इधर आना मेरे पास, मैंने उसे पास बुलाया। उसका चेहरा हाथों में लेकर कहा, वादा करो कि ज़िन्दगी में ऐसी बेवकूफ़ी की हरक़त फ़िर कभी नहीं करोगी, तुम मुझे बहुत प्यारी हो। प्यार से पिघल गयी सुनैना, मेरे गले लगकर बोली, नहीं दीदी अब कभी नहीं, ऐसा कभी सोचूँगी भी नहीं।

अगले दिन उसकी माँ को बुलाकर बात करनी पड़ी, कि कुछ दिन तो रुक गयी है लड़की लेकिन अब इसकी शादी का इंतज़ाम करो।

वाक़ई कच्ची उम्र का हो या किसी भी उम्र का, यह प्यार, आकर्षण या जो भी आप इसे कहें, इसी तरह दिमाग़ पर असर करता है, आप पढेलिखे हों या अनपढ़-गंवार प्रेम के आकर्षण के विज्ञान को समझना अत्यंत कठिन है। यदि आप समझते हैं कि कोई भी किसी दूसरे के अनुभव से सीख सकता है तो आप ग़लती पर हैं। यह एक ऐसा अनुभव है जिससे हर कोई गुज़रना चाहता है। मनुष्य की प्रवृत्ति ही ऐसी है कि आगे आने वाले समय का न ही पूर्वानुमान लगा सकता है न ही इतना आगे का सोच सकता है। सुनैना भी कोई अपवाद न थी।

आख़िर सत्रह साल की उम्र में सुनैना की शादी हो गयी। सुनैना को जैसे जीवन की सारी खुशियाँ मिल गयीं, मनचाहा जीवनसाथी मिल गया, मनपसंद ढंग से शादी हो गयी, प्यार सफ़ल हो गया। लेकिन, क्या वाक़ई यही सच था, शायद नहीं।

इस बीच हम शहर छोड़ कर दूसरे शहर में बस गये थे, सुनैना के फ़ोन आते रहते, हम सब अपनी-अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त हो चुके थे।

शादी के छः महीने गुज़रते ही सुनैना का पहला गर्भपात हुआ। सुनैना को देखकर कोई भी बता सकता था कि सेहत के साथ खिलवाड़ हो गया है। ख़ैर, ज़िन्दगी फ़िर आगे बढ़ी, साल बीतते फ़िर से गर्भवती सुनैना को एक बेटी हुई। एक साल और बीतते ही एक और बेटी हुई। इक्कीस साल से भी कम उम्र में सुनैना दो बेटियों की माँ थी और एक बेरोज़गार पति की पत्नी थी। प्रेम!!! प्रेम क्या होता है, क्या यही प्रेम होता है, ख़ुद से सुनैना यह सवाल करने लगी थी।

बहुत दिनों के बाद एक दिन के लिये मेरा शहर आना हुआ और सुनैना ने मुझसे मिलने की इच्छा जाहिर की। उसकी राम कहानी सुनने के बाद मैंने पूछा, सुनैना अब क्या इरादा है, आगे ज़िन्दगी कैसे काटोगी? क्या पति कुछ काम-धाम करना चाहता है या नहीं? सुनैना बोली, दीदी जी, ड्राइवरी कर लेते हैं पर गाँव में काम मिलता नहीं, समझ में नहीं आता क्या करें। मैंने सुनैना को याद दिलाया कि तुम मेहंदी की बड़ी अच्छी डिज़ाइन बनाती थीं, याद है या भूल गयी? याद है दीदी जी, लेकिन अब समय ही नहीं मिलता, दिनभर तो घर के काम में बीत जाता है। लेकिन, इतना कहते ही सुनैना को जैसे राह मिल गयी। जल्दी से सामान समेट जाने को हुई, मैंने पूछा, कहाँ, इतनी जल्दी? नहीं, दीदी जी, अब रुक गयी तो बड़ी देर हो जायेगी। आपसे दो साल बाद मिलूँगी, यहीं इसी शहर में, आप मिलेंगी ना? हाँ, हाँ, क्यों नहीं, न जाने क्यों इस साहसी, आत्मविश्वासी लड़की को देख मेरे चहरे पर एक मुस्कान तैर गयी।

दो साल बाद, मैं "सुनैना ब्यूटी पार्लर" में सुनैना से बातें कर रही थी। कैसी हो सुनैना? दीदी जी, हम सब बहुत ख़ुश, बहुत मजे में हैं। मेरी बड़ी बेटी अब स्कूल जाती है, यहीं घर के पास में है, छोटी को घर पर सास सम्हाल लेती हैं, पति ने एक ऑटो ले लिया है, अपना ऑटो चलाते हैं। मैंने पूछा, सुनैना और बच्चे? कभी नहीं दीदी जी, अब कभी नहीं। हा हा हा। बेटा नहीं चाहिये तुम्हें? सुनैना मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दी।

Sunday, January 24, 2016

(5) "ऋषि पत्नी" (कहानी)

भोर का समय है, चहुँ ओर अन्धकार व्याप्त है, प्राची के आकाश पर भगवान विवस्वान का रथ अभी भी उपस्थित नहीं है। गँगा नदी के तट के समीप निविड़ नीरव अरण्य में स्थित आश्रम में एक ऋषि तपस्या में लीन हैं। शांत मुख मंडल और शांत धरा। ऋषि पत्नी नित्यप्रति की भाँति व्यस्त हैं, अभी ऋषि गौतम गँगा स्नान के लिये जायेंगे, उनके लिये वस्त्र इत्यादि व्यवस्थित कर लूँ। वर्षों से नित्य-प्रति का यही नियम। ऋषि गौतम न्यायशास्त्र की रचना में लीन हैं, समर्पित पत्नी के होने से जीवन के कितने ही अभाव दूर हो गये हैं, कितने संतुष्ट और शांत हैं। न्यायशास्त्र की रचना करना क्या विचलित मनःस्थिति में संभव होता, कदाचित नहीं।
आह, ऋषि गौतम और ऋषि पत्नी इंद्र-चंद्र के खलयंत्र से कैसे अनभिज्ञ रह गये? अपने तेज़ से भूत-भविष्य का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले ऋषि गौतम कैसे आप अनभिज्ञ रहे? या मात्र परीक्षा ही लेनी थी आपको अपनी पतिव्रता स्त्री की? विश्वास कैसे खण्डित हुआ? आने वाला समय प्रश्न अवश्य पूछेगा।
पुनः भोर है, वही दिनचर्या, नहीं, यह भोर भिन्न है, कुछ अवश्य ही सही नहीं है। ऋषि गौतम इतने शीघ्र स्नान से लौट आये हैं, यह कैसे? आकर पत्नी का सानिध्य चाहते हैं, क्यों? पति पर संदेह अहिल्या करें, यह कैसे संभव है? नहीं, यह छल है, छल, छल कैसे? पति पर संदेह, घोर अपराध। यही तो शिक्षा पायी है अहिल्या ने, पति समर्पण ही स्त्री-धर्म है। धर्म विमुख कैसे हो सकती हैं, नहीं हो सकतीं।
ऋषि गौतम गँगा-स्नान से वापस आकर, अपने आश्रम से अपनी ही छवि वाले मनुष्य को निकलते देख रुक जाते हैं। सहस्राक्ष शचीपति देवराज, क्यों? द्वारपाल के रूप में चंद्र, क्यों? कामी-लोलुप इंद्र-चंद्र द्वै, खलयंत्रकारी समुच्चय। तपस्या से उत्पन्न तेज अब क्रोधाग्नि में परिवर्तित हो चुका था, अहिल्या के सतीत्व पर कुदृष्टि डालने वाले देवराज, आज से तू पद्च्युत हो जा, तेरे सारे शरीर पर सहस्र नेत्र उग आयें, कभी कोई तेरी आराधना न करे, तुझसे कुछ याचना न करे, हे चंद्र, तेरी ओर देखने वाला कलंकी हो, नीच।
ऋषि पत्नी अहिल्या यह देख-सुनकर उसी क्षण शिला समान हो भूमि पर स्थापित हुईं, यह कैसा दुर्भाग्य, यह कैसा अनर्थ हुआ। क्या समर्पण ही मेरा दोष, क्या विश्वास ही मेरा दोष?
ऋषि गौतम ने आश्रम त्याग दिया, अहिल्या शिलारूप में वहीं रह गयीं। अनेक युग बीत गये। 
दो सुकुमार बालक अपने गुरु ऋषि विश्वामित्र के साथ वन भ्रमण पर आये हैं। पुनः भोर का समय है, भगवान विवस्वान के उदय के साथ ही दूर गहन वन में एक निर्जीव आश्रम दृष्टिगोचर होता है। बालक अपने गुरु से प्रश्न करते हैं, गुरु जी, यह कोई आश्रम प्रतीत होता है, परन्तु इतना निर्जीव क्यों है? किसी पशु-पक्षी के भी दर्शन नहीं होते? ऋषि विश्वामित्र निर्देश देते हैं, बालकों, यह ऋषि गौतम का आश्रम है, उनकी पत्नी तपस्या में लीन हैं, जाकर उनके दर्शन करो पुत्र।
राम, ऋषि पत्नी अहिल्या के समीप हैं, अहिल्या के प्रथम दर्शन पाने वाले राम उनकी चरणरज लेकर माथे से लगाते हैं। अहिल्या नेत्र खोल देती हैं, राम, पुत्र राम। शिलारूप प्राप्त ऋषि पत्नी पुत्र राम के स्पर्श मात्र से जैसे सजीव हो उठी थीं। राम के नेत्रों से अश्रुधारा बह रही है, अहिल्या के नेत्रों से इतने दिनों का संचित अपराधबोध बह निकलता है जैसे आज सारी सीमायें तोड़ ही देगा। राम, मेरे राम, मेरा....कुछ नहीं माँ, आप सदा वंदनीया, प्रातः स्मरणीया हैं, आप ऋषि पत्नी हैं माँ। शांत होइये, मुझे आशीर्वाद दीजिये माँ।
सदा सुखी रहो राम, विजयी भव पुत्र।
सजल नेत्रों से राम को विदा करती हैं ऋषि पत्नी।

(पौराणिक कथाओं की अधिक जानकारी मुझे नहीं है, संदर्भ व प्रसंग में त्रुटियाँ संभव हैं, अतः आप सभी से अनुरोध है कि इसे एक काल्पनिक कथा ही मानें 

Friday, January 22, 2016

(4) "भूख़ (मेरी चौथी कहानी)"

गिरिजा देवी, यही नाम था अजिया का। अजिया मतलब, दूर के रिश्ते में वो मेरी नानी की सास लगीं। जब हम लोग नानी के गाँव जाते तो उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व से प्रभावित हुये बिना न रह पाते थे। वो जानती थीं कि हम बच्चे शहर के स्कूलों में पढ़ते हैं, गाँव की बोली-भाषा हमारे पल्ले नहीं पड़ेगी और हम लोग पगलैट नज़र आयेंगे, इसलिये हम लोगों से खड़ी बोली हिंदी में ही बात करतीं थीं। उनका स्वर बहुत रौबदार हुआ करता। गोरा-चिट्टा रंग-रूप और कलफ़दार सूती साड़ी पहने वह किसी सुंदरी से कम न लगती थीं। उनका पक्का मकान गाँव में सबसे अच्छा था। घर से लगा हुआ पक्की जगत वाला, मीठे पानी का एक पुश्तैनी कुआँ था। हम बच्चों के लिये कुँए से पानी भरकर लाना एक मजेदार अनुभव होता था।
दादा-अजिया शहर की सरकारी नौकरी से रिटायर होकर गाँव वाले अपने पक्के मकान में आकर बस गये थे। एक पक्का मकान अब शहर में भी था। अजिया की एकमात्र संतान उनका पुत्र था। वह शहर में बैंक में काम करते, देखने-सुनने में बेहतरीन, पर उन्हें शराब पीने की बुरी लत लगी हुई थी। हर महीने के अंत में मिलने वाली सारी तनख़्वाह इसी लत को समर्पित थी। हर बस वाला जिससे वो गाँव आते-जाते थे उन्हें पियक्कड़ बाबू के नाम से जानता था। पियक्कड़ बाबू जब इस लत के शिकार नहीं थे तब उनका विवाह एक सुंदर-सुशील कन्या जानकी के साथ हुआ था और इस युगल के दो पुत्र थे। यह परिवार शहर वाले मकान में रहता था। बच्चे शहर में ही स्कूलों में पढ़ते थे।
अपने बेटे की शराब पीने की लत से अजिया बहुत दुःखी रहतीं और सोचतीं कि किसी प्रकार इस दुर्गति से छुटकारा मिले।लेकिन वो दोहा है ना,
बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय।।
उसी प्रकार, एक बार बिगड़े हुये बाग़ को तो फ़िर से बसाया जा सकता है पर बिगड़ी संतति को फ़िर से बनाने का कोई उपाय नहीं, निश्चितरूप से कोई उपाय नहीं। एक संतान आगे आने वाली कई पीढ़ियों की वाहक होती है, वह उन्हीं संस्कारों को लेकर आगे बढ़ती है जो उसे विरासत में मिले हैं, आप लाख़ प्रयास कर लें इसे बदल पाना अत्यंत कठिन है।
अंततः वही हुआ जो नहीं होना चाहिये था, पर जो होकर ही रहा। पिता की देखादेखी वही करतूतें अजिया के बड़े पोते ने भी शुरू कर दीं, दिन बीतने की देर न थी कि छोटा भाई भी उसी राह पर। दो सुंदर-सुंदर बच्चे जो बड़े तो हुये पर इंसान न बन पाये।
जैसी जिसकी आदतें होती हैं उसका उठना-बैठना भी समान आदतों वालों के साथ होता है। इसी संगति के चलते शहर वाले मकान पर दबंगों का कब्ज़ा हुआ और गाँव की ज़मीन भी बिक गयी। ले दे कर गाँव का मकान ही बचा था जिसमें अब बस अजिया ही जीवित बची थीं।
इंसान चाहें शिशु हो या युवा या वृद्ध, एक बात जो जीवन की हर अवस्था में समानरूप से उपस्थित रहती है वह है भूख़, यह मृत्यु के साथ ही समाप्त होती है। अजिया का परिवार पतन के उस दौर से गुज़र रहा था जो अपनी नियति के लिये स्वयं उत्तरदायी था। आर्थिक सम्पन्नता क्या चीज़ है, कुछ नहीं। अजिया से अधिक धनी स्त्री तो पूरे गाँव में नहीं थी। चल-अचल सब संपत्ति थी उनके पास, आह दुर्भाग्य! आज यह कि एक रोटी के लिये वह सबके दर पर जातीं और लोग दुत्कार देते।
नानी सहृदय थीं और अपनी क्षमता भर उनकी सेवा करतीं फ़िर भी, अपनों की कमी उन वृद्ध स्त्री के हृदय पर गहरा आघात कर गयी थी।
बहुत दिनों के बाद मेरा गाँव जाना हुआ। देखा तो उनके मकान पर ताला लगा था। मैंने नानी से पूछा, अजिया कहाँ गयीं। नानी ने बताया कि दो दिन तक किवाड़ नहीं खुले और तोड़ कर देखा गया। वो खटिया पर निष्प्राण पड़ी थीं। आख़िर साँसों की डोर कब तक थमी रहती।
- अनामिका

Tuesday, January 19, 2016

"जैपनीज़ टी सेरेमनी"

जैपनीज़ टी सेरेमनी जापानी परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी भी व्यक्ति के लिये यह एक अद्भुत व अभूतपूर्व बात हो सकती है। अपने अनुभव के आधार पर मैं अवश्य यह कहूँगी कि यदि संभव हो तो इसका अनुभव करना चाहिये।
यह "टी हाउस" हमारे निवास स्थान के बहुत नज़दीक है लेकिन कभी जाने का सोचा नहीं था, कारण था भाषा की जानकारी न होना। उस दिन 5 जनवरी, 2016 को सुबह सेंसेई ने फ़ोन किया, "अनामिका-सान, Are you busy?", (मुझे लगा कि मुझे उनके साथ शायद डांस क्लास में जाना था और मैं भूल गयी हूँ), मैंने पूछा, "Do we have dance class today?", सेंसेई की आवाज़,"No, no, not that, I want you to come for a Japanese Tea Ceremoney today at 1 O'Clock, Can you and Swarnim come? अपने तीन वर्षों के प्रवास में मैंने कभी इस बारे में सोचा ही न था। बेमन से ही सही, मैं राज़ी हो गयी।
हम दोनों सही समय पर कल्चर ज़ोन (जहाँ यह टी हाउस है) पहुँच गये।
वहाँ जाकर सेंसेई से पता चला कि यह विशेष सेरेमनी इस टी हाउस में साल में सिर्फ़ एक बार होती है, उन्हें इसकी जानकारी थी क्योंकि उनके पास पैम्फेलेट्स आते हैं (आते तो हमारे यहाँ भी हैं पर हम कौन सा पढ़ पाते हैं)।
अब हम टी हाउस में जाते हैं, जनवरी की ठंड में ये पहला कोज़ी रूम बड़ा अच्छा लगा। उसके बाद एक "तातामी रूम" है, तातामी रूम में ही बैठकर चाय पी जायेगी। तातामी रूम में जाने से पहले जूते हटाने होते हैं और एक दो सीढ़ी चढ़कर तातामी रूम आता है। इस रूम में तीन तरफ़ लकड़ी की दीवारें हैं और एक तरफ़ की पूरी दीवार काँच की है, यह हिस्सा गार्डन की तरफ़ खुलता है। यह तातामी रूम काफ़ी बड़ा है। हम तीनो लोग, सेंसेई, स्वर्णिम और मैं इस प्रकार बैठाये जाते हैं कि चाय पीते समय हम गार्डन को आराम से देख सकें। चाय सर्व करने वाली महिला प्रौढ़ हैं, उन्होंने किमोनो पहना हुआ है, उनकी सहायिका एक युवती हैं, इन्होंने ही हमें टी रूम में वेलकम किया था। तातामी रूम के बीच में ज़मीन के अंदर एक हीटर रखा है, जिस पर एक लोहे के भारी से बर्तन में पानी गर्म हो रहा है, इस केतलीनुमा बर्तन से पानी की भाप निकल रही है जो कि माहौल को और कोज़ी बना रही है। बर्तन के एक तरफ़ हम तीनो बैठे हैं और दूसरी तरफ़ चाय सर्व करने वाली महिला बैठी हैं। जापानी लोग आराम से वज्रासन में बैठ लेते हैं पर मेरे लिये यह बहुत कठिन काम है अतः हमें विदेशी होने के नाते छूट मिल गयी और हम आराम से सुखासन में बैठ लिये।
चाय सर्व करने से पहले हम तीनों के सामने स्ट्राबेरी फ़्लेवर की एक मिठाई रखी गयी, इसे खाने के लिये बांस के बने छोटे-छोटे चम्मच भी रखे गये। ये चम्मच हैंडमेड थे और उन्होंने ही बनाये थे जो चाय सर्व करने वाली थीं। मिठाई दिये जाने का कारण यह बताया गया कि, "ग्रीन पाउडर्ड टी" जिसे जापानी भाषा में "माचा" कहते हैं पीने में कड़वी होती है, मिठाई के साथ कम कड़वी लगती है। आधी मिठाई खा चुके होने के बाद चाय सर्व की गयी।
चीनी मिट्टी के प्यालों में ग्रीन टी का पाउडर था, हमारे सामने के पानी के बर्तन से, एक बांस के चमचे से, पानी निकाल कर चाय के प्यालों में डाला गया। अब हम तीनों को एक-एक बीटर (बांस का बना हुआ) दिया गया, इस बीटर से चाय के पाउडर और पानी को इस प्रकार मिलाना था कि झाग बन जाये (ऐसी ग्रीन टी मैंने पहली बार ही पी थी, बेशक़ कड़वी ही थी). चाय पीने का यह अनुभव इसलिये ख़ास है कि यह एक परिवेश को सम्पूर्णरूप से आत्मसात करने का अनुभव था, किसी प्रकार की जल्दी नहीं, कोई हड़बड़ी नहीं, चाय पीते हुये बाहर गार्डन को निहारना और तातामी रूम की कोज़ीनेस और हरी चाय की ख़ुशबू को हमेशा के लिये बसा लेना। किसी ज़माने में ये टी हॉउसेज़ मंत्रणा कक्ष होते थे। जापान में टी हाउस अपेक्षाकृत काफ़ी बड़े आकार के होते हैं, यह कोई सामान्य बात नहीं है, क्योंकि यहाँ इतनी जगह तो महँगे रेस्टॉरेंट्स में भी नहीं होती।
टी सेरेमनी के दौरान दो महिला आगंतुक और आयीं, साथ में आये पाँच बच्चे। तीन बच्चे जो शायद नर्सरी या प्ले ग्रुप के बच्चे थे, उन्हें इस एक्सपीरियंस के लिये लाया गया था, बाकी दो बच्चे छोटे थे और अपनी-अपनी मम्मियों से चिपके थे। इन तीनों बच्चों में एक लड़का और दो लड़कियाँ थीं। लड़का हर बात पर सिर हिलाता जा रहा था और जैसे ही मिठाई सर्व की गयी, उसने फ़टाफ़ट निपटाई। मैं मन ही मन सोचती रही कि बेटा अब माचा कैसे निपटाओगे, स्वीटू। बड़ा प्यारा लगा वो नन्हा-मुन्ना। दुनियाभर के लड़के मिठाई के शौक़ीन होते हैं, ये विश्वास भी पुख़्ता हो गया। गोलू-मोलू को वहीं छोड़ हम गार्डन में निकल गये। वहाँ तालाब में मछलियाँ देखीं और प्लम के फ़ूल सूँघते हुये घर वापस आ गये।
इस अनोखे अनुभव के बारे में यही कह सकती हूँ कि कुछ खुशबुएँ और कुछ दृश्य हमेशा के लिये दिल में बस गये।
(अधिक जानकारी के लिये यह लिंक भी शेयर कर रही हूँ:-
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Japanese_tea_ceremony)

Monday, January 18, 2016

(3) "कँचन (मेरी तीसरी कहानी)"

उसने एक हाथ में झोला उठाया जिसमें आशीष के कुछ कपड़े और थोड़ा सा ज़रुरत का सामान था। डेढ़ साल का नन्हा आशीष उसके वक्ष से लगा सो रहा था, दुनिया की हक़ीक़त से बेख़बर। किराये भर के चंद रूपये ले कर और मन में एक निश्चय के साथ कँचन ने घर की देहरी के बाहर अपना अंतिम पग रख दिया था, फ़िर कभी मुड़कर न देखने के लिये।
छः बहनों की सबसे छोटी बहन, घर में सबकी लाड़ली। बड़ी बहनों के रहते कभी घर के काम न करने पड़े थे, बस एक ही काम था जो उसे हमेशा करना होता, वो था कॉलेज जाना और फ़िर सारा दिन क़िताबों में सिर खपाना। दिन बीतते गये और कँचन अब रसायन विज्ञान में परास्नातक हो चुकी थी। एक-एक कर सारी बहनें अपने-अपने घर ब्याह कर जा चुकी थीं। कँचन ने अब एक विद्यालय में पढ़ाना शुरू कर दिया था, समय रहते बीएड भी कर लिया। कँचन के दिन इसी तरह गुज़र रहे थे।
पिता के लिये कँचन की शादी से बढ़कर अब कोई ज़िम्मेदारी नहीं बची थी अतः एक बैंक में काम करने वाले शैल के साथ कँचन की शादी पक्की की और शुभ दिवस पर यह कार्य भी संपन्न हुआ।
पिता के घर से विदा होकर शैल के घर की देहरी पूजते हुये मन में सोचती जाती कि अब यहीं से मेरी अंतिम यात्रा होगी। गृहणी, पत्नी, बहू और माँ बस यही रूप तो सोचे थे अपने लिये कँचन ने, इतने ही उसके सपने और इतनी ही उसकी दुनिया, उसके आस-पास की दुनिया इससे अलग़ कब थी।
लेकिन, नियति को तो शायद कुछ और ही मंज़ूर था।
शैल, यथा नाम तथा गुण। शैल को कँचन का साधारण रूप रंग पसंद न था। विवाह किस मजबूरी में किया था ये तो ईश्वर ही जानें। घर को बनाने, बसाने की कँचन की हर कोशिश शैल को नागवार गुज़रती। जब किसी को कोई व्यक्ति अप्रिय होता है तो उसके द्वारा किया गया हर कार्य अवाँछित लगता है, अतः कँचन एक रूपया भी खर्चती तो वह शैल की नज़रों में फ़िज़ूलखर्ची होता। धीरे-धीरे इन बातों में सास की शह भी शामिल हो गयी। अब हर छोटी से छोटी बात तिल का ताड़ बन जाती। कँचन यह सोचकर सब सहती कि हर घर की यही कहानी होती है, मैं कौन सी अनोखी हूँ। इस बीच आशीष का जन्म हुआ, कँचन को लगा कि शायद अब स्थितियाँ कुछ बदल जायेंगी। लेकिन, ये तो एक मरीचिका थी, और मरीचिका कोई समस्या नहीं कि जिसका कोई हल हो। स्थितियाँ बदलती तो हैं, कँचन की भी बदलीं, पहले से भी बदतर।
आख़िरकार शैल ने सीमायें तोड़ ही दीं और कँचन को पीटते हुये कहा की अग़र ज़रा भी ग़ैरत बाकी है तुझमें तो मुझे अपनी शक़्ल भी न दिखाना। अपमान और तिरस्कार अब असहनीय हो चला था, एक पल भी और इस घर में रुक जाना मानो मृत्यु के सामान था। सहनशक्ति की भी एक सीमा है, हतप्रभ सी कँचन को जीवन की चुनौती स्वीकार करनी थी, रह-रह कर उसे अपने नन्हे शिशु का ख़याल आता और वो सोचती कि एक बालक के लिये माता-पिता समानरूप से आवश्यक हैं, लेकिन उसे यह भी समझ आ चुका था कि स्त्री को अपमानित करने वाला पुरुष एक अच्छा पिता नहीं हो सकता। बिना पिता के शिशु का पालन किया जा सकता है परन्तु असामाजिक पिता एक अच्छी संतति के लिये घातक है। निर्णय लेकर कँचन निकल पड़ी थी जीवन का सामना करने।
कँचन ने अपनी शिक्षा को आगे जारी रखने के साथ-साथ एक विद्यालय में पढ़ाना शुरू किया। आशीष की परवरिश में कँचन कोई कसर नहीं रहने देना चाहती थी, इसलिये ऍम फ़िल, पीएचडी, नेट सब कर डाला, और आख़िरकार कँचन को व्याख्याता पद मिल ही गया। बच्चा धीरे-धीरे बड़ा हो गया। इंजीनियरिंग करके आशीष की पोस्टिंग मुम्बई में हो गयी थी।
कोई बहुत देर से दरवाज़े की बेल बजाये जा रहा था। आती हूँ, आती हूँ, कह कर कँचन ने दरवाज़ा खोला, देखा तो सामने आशीष खड़ा था। पच्चीस साल का आकर्षक नवयुवक है आशीष। आशीष ने झुककर माँ के पैर छुये, कँचन आश्चर्य से उसे देख रही है, ये पैर क्यों छू रहा है रे। तभी दरवाज़े की ओट से एक सुंदर नवयुवती निकल आयी है, आशीष ने अपनी माँ से उस युवती का परिचय करवाया। माँ यह तुम्हारी बहू निशा हैं, आशीर्वाद नहीं दोगी।
सदा सुखी रहो मेरे बच्चों, ज़रा ठहरो। अंदर से पूजा की थाली ला कर, दोनों की आरती कर गृहप्रवेश कराया। बेटी तुम इस कमरे में आराम करो, किसी प्रकार की चिंता मत करना, आज से मैं ही तुम्हारी माँ हूँ।
चाय का एक कप आशीष को दे कर कँचन सामने बैठी हैं, आशीष भी माँ को देख रहा है। विश्वास है ना माँ मुझपर, आशीष ने पूछा। प्रत्युत्तर में कँचन बस मुस्कुरा दीं।  
सबकुछ बहुत जल्दी में हुआ माँ, तुम्हें ख़बर ही न कर पाया। तुम जानती हो ना, मेरे दोस्त श्याम की शादी थी, जिस लड़की से श्याम की शादी हुयी है, निशा उसी की बड़ी बहन हैं। सभी लोग ये जानने को उत्सुक थे कि बड़ी बहन के अविवाहित होते हुये छोटी बहन की शादी क्यों हो रही है। सभी निशा को अविवाहित समझ रहे थे जबकि सच तो ये था कि इनकी शादी हो चुकी थी और शादी के पंद्रह दिन बाद ही रोड एक्सीडेंट में इनके पति की मृत्यु हो गयी थी। तब से ये अपशकुनी होने का कलंक अपने माथे ढ़ो रही थीं। इनके जीवन में ख़ुशियों के रंग भरने के लिये उसी मण्डप में मैंने निर्णय लिया कि मैं शादी करूँगा तो इन्ही से वरना सारी ज़िन्दगी शादी नहीं करूँगा। मैंने इन्हें अपने निर्णय के बारे में बताया तो इन्होंने मुझे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन मेरा निश्चय अडिग था। आख़िरकार सबको राज़ी होना ही पड़ा। बोलो माँ, मैंने सही किया ना?
हाँ, मेरे बच्चे, तुमने बिल्कुल ठीक किया, और कँचन ने उठकर बेटे को गले से लगा लिया। मन ही मन ईश्वर को नमन किया, आज मेरी तपस्या पूर्ण हुई, अब जीवन से कुछ नहीं चाहिये।
- अनामिका 

हेल्थ-टिप्स

आज आप सभी के साथ कुछ हेल्थ-टिप्स शेयर करने जा रही हूँ, हालाँकि मैं ख़ुद ऐसा नहीं मानती कि मैं 100% सही ही कह रही हूँ। ये टिप्स "अन्य बातें सामान रहने पर" की assumption के साथ ही काम करेंगे।
१. हमेशा ताज़ा: नियम बना लें कि बासी भोजन को हमेशा के लिये ना, और इस नियम का कड़ाई से पालन करें, जैसे ही आपने यह नियम तोड़ा आपका वज़न बढ़ना शुरू हो जायेगा, जिसे कण्ट्रोल करना टेढ़ी खीर है। केवल ताज़ा भोजन ही करें। स्वास्थ्य की कोई समस्या नहीं होगी। ताज़े भोजन का अर्थ है, अच्छी तरह साफ़ किया हुआ भोजन। इसलिये अपने भोजन की ज़िम्मेदारी आपको ख़ुद ही ले लेनी चाहिये, दूसरा व्यक्ति पता नहीं क्या बनाकर दे।
२. शाकाहार: मैं पूर्णतया शाकाहारी हूँ। शायद स्लिम रहने में शाकाहारी होना काफ़ी मददगार है। सर्दियों के मौसम के अलावा तला-भुना खाना खाने में परहेज़ ही करती हूँ।
३. मीठे हो लिमिटेड: मैं ख़ुद को लकी मानती हूँ कि मीठा खाना अधिक पसंद नहीं, चाय ज़रूर मीठी ही पीती हूँ। मीठा पसंद करने वालों के लिये weight control अधिक कठिन प्रक्रिया है। उन्हें चाहिये कि वो मीठे ड्राई फ्रूट्स से काम चलायें।
४. बाज़ारी चीज़ों से परहेज़: जो चीज़ें एक ही प्रकार के तेल में बार-बार तली जाती हैं,(बाज़ार की चीज़ें) उस तेल में बार-बार गर्म किये जाने के कारण हानिकारक केमिकल reactions होती हैं, ये हमारे शरीर के स्वास्थ्य के लिये बहुत ही हानिकारक हैं, अतः परहेज़ करें।
५. प्रकृति के क़रीब रहें: बनावटी/आर्टिफिशल चीज़ों और लोगों से दूर रहें, अपने शरीर की प्रकृति के अनुसार चलें। ज़रूरी नहीं कि जो चीज़ मुझे सूट करती हो आपको भी करे। जितना हो सके साधारण और सरल जीवनशैली अपनायें।
६. व्यायाम: मनुष्य का शरीर चलने-फिरने के लिये बना है। पैदल चलना, सीढ़ियाँ चढ़ना, साइकिल चलाना, रस्सी कूदना, तैरना, बैडमिंटन खेलना, योगा-प्राणायाम-ध्यान, इत्यादि, यानि की, जो भी आपसे हो सके वो व्यायाम करें, कम से कम व्यायाम करना है इस बात का स्ट्रेस मत लें। मस्त रहें।
७. हॉबीज़: ख़ुद को किसी न किसी हॉबी में बिज़ी रखें। यह हमें ओवरईटिंग से बचाता है।
८. नवब्याहता: नयी-नयी शादी के बाद स्लिम से स्लिम लड़कियों से साथ वेट issues होने लगते हैं, उसका सबसे बड़ा कारण होता है कि वो कई बार संकोचवश खाने के मामले में ना नहीं कह पाती हैं और घरवालों से हार जाती हैं, उन सभी से मेरा एक निवेदन है, आपका शरीर आपकी पहली ज़िम्मेदारी है, अतः दृढ़ता से काम लें। "पहला सुख, निरोगी काया"
९. डाइटिंग: किसी के कहने पर अचानक से कोई नयी डाइटिंग मत शुरू करें, ख़ासकर लड़कियाँ। आपका एंडोक्राइन सिस्टम बहुत ही नाज़ुक होता है, वातावरण के हल्क़े से हल्क़े सिग्नल को भी पकड़ लेता है और फ़िर आपका शरीर उसी प्रकार प्रतिक्रिया देता है। अतः हर काम साधारण तरीके से करें, किसी भी प्रकार की अति से बचें। याद रखिये कि शरीर को किसी पुरानी आदत को छोड़ने या नयी आदत अपनाने में कम से कम २१ से ४० दिन का समय लगता है।
१०. नींद: भरपूर नींद लें। जल्दी सुबह उठना स्वास्थ्य के लिये निःसंदेह लाभकारी है, कैसे मैनेज होगा ये आप स्वयं निर्धारित कीजिये। अच्छे स्वास्थ्य के लिये यह कोई बहुत बड़ी कीमत नहीं है।
निष्कर्ष:- अच्छी बातें हम सभी को लगभग पता हैं, जो इनका पालन कर पाता है वही राजा है, उसका अपने शरीर की गतिविधि पर काफ़ी हद तक कण्ट्रोल होता है।

"परिवर्तन सृष्टि का नियम है।"

हम सब में से अधिकाँश लोग उदासी के दौर से गुज़रते हैं, कुछ समय के बाद सबकुछ सामान्य हो जाता है। इस अवस्था के अनेक मनोवैज्ञानिक और क्लिनिकल कारण हो सकते हैं परंतु मेरे विचार से, इन कारणों में जो सबसे सामान्य कारण है, वह है अवस्था परिवर्तन को स्वीकार न कर पाना( refusal to change, inertia)।
आपने छोटे बच्चों को कम ही उदास देखा होगा, उसका कारण है कि छोटे बच्चे अवस्था परिवर्तन को सहजरूप से स्वीकार कर लेते हैं, फ़िर क्या कारण है कि बड़े लोग ऐसा नहीं कर पाते? उम्र में बड़े होने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि हम हर स्थिति को अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि आराम की जो भी स्थिति निर्मित हो गयी है उसमें रत्ती भर भी बदलाव न आये। दिन-पर-दिन हमारी अवस्था परिवर्तन को स्वीकार कर सकने की क्षमता कम होती जाती है और साथ ही हमारे सब्र का बाँध भी टूटने लगता है। नतीज़तन हम एक हताश व निराश व्यक्ति में बदलने लगते हैं। आप स्वयं देखिये, उचित क्या है? अवस्था परिवर्तन के साथ स्वयं को ढ़ालना या बदलने से इंकार करना? यहाँ आपको यह याद रखना होगा कि परिवर्तन सृष्टि का नियम है और इस नियम में सृष्टि वज्र समान निष्ठुर है। परिवर्तन तो होकर ही रहता है, आप चाहें या न चाहें। जिसने जन्म ले लिया, वह सदैव शिशु बनकर तो नहीं रह सकता, उसे हर अवस्था से गुज़रना ही पड़ेगा, उसके चाहने या न चाहने से कुछ अंतर नहीं पड़ता। अब यह निर्णय आपको करना है कि आपको प्रकृति/सृष्टि के साथ चलना है या उसके विपरीत। इसका उत्तर आप भलीभाँति जानते हैं।

Saturday, January 16, 2016

(2) "कल्पना" (मेरी दूसरी कहानी)

कल्पना हमारे साथ ग्यारहवीं में पढ़ती थी। सोलह साल की नयी उमर की लड़कियाँ और उनके सुनहरे सपने। पता नहीं उसके कोई सपने थे भी या नहीं, कुछ पता नहीं, कभी पूछा ही नहीं, क्योंकि वो हमसे अलग़ थी, मतलब शादीशुदा थी। लड़कियों के स्कूल में हमारे साथ विज्ञान की छात्रा थी। उसने जीवविज्ञान लिया था, मेरे पास गणित था, बस यही अंतर था हम दोनों में, ये कोई बड़ी बात नहीं थी, बाकि के चार विषय, हिन्दी, अँग्रेज़ी, भौतिक विज्ञान और रसायन विज्ञान तो हम लोग साथ ही पढ़ते थे। हमारी प्रायोगिक कक्षायें अलग़-अलग़ होती थीं, कभी साथ नहीं पड़ा तो यह नहीं कह सकती कि वो कितनी अच्छी छात्रा थी, लेकिन इतना तो निश्चित है कि वो ज़रूर एक दृढ़निश्चयी लड़की थी।
मैंने उसे हमेशा दूर से ही देखा लेकिन गंभीरता से देखा, आज 23 साल बाद उसकी कहानी लिख रही हूँ तो ज़रूर ध्यान से ही देखा होगा। दूरी उसके कारण नहीं थी, वो बहुत प्यारी लड़की थी, मैं ही गणित में डूबी रही, दोस्ती करने और लोगों को जानने पर कभी ध्यान ही ना दिया।
मन में ये ज़रूर सोचती कि कोई न कोई मजबूरी ज़रूर रही होगी उसके माता-पिता की, जो उसे इतनी कम उमर में ब्याह दिया। लेकिन ये अच्छा लगता कि कम से कम उसे ज़िन्दगी ने एक मौका और दिया। शादी हो गयी और ज़िन्दगी ख़त्म, ऐसा तो नहीं हुआ उसके साथ।
लेकिन, ज़िन्दगी इतनी आसान कहाँ।
साल बीता और हम बारहवीं में आ गये। कल्पना अब गर्भवती थी। स्कूल में अन्य लड़कियों ने उसके बारे में तरह-तरह की बातें शुरू कर दीं। मैं सब सुनती थी, पर प्रतिक्रिया करना मेरी आदत में शुमार न था, इसलिये, सुना, सब सुना, बहुत बुरा लगा। एक शादीशुदा लड़की ने गर्भवती होकर कोई अपराध तो किया नहीं था, लेकिन, एक बात तभी समझ में आ गयी कि समाज ऐसा ही है। लड़कियों को हर स्थिति में समाज की कसौटी से गुज़रना ही होता है, उनकी इच्छा हो या ना हो। ना ही शादी कर लेने का निर्णय उसने लिया ना ही माँ बनने का या इसके विपरीत, जो भी हो। घटनायें एक-दूसरे से संबन्धित होती हैं फ़िर भी उसे बख़्शा नहीं गया। यहाँ तक कि अध्यापिकाओं ने भी उससे प्रश्न किये कि तुमने इस स्कूल में एडमिशन ही क्यों लिया, यहाँ तो ड्रेस के लिये भी बहुत कड़े निर्देश हैं (ड्रेस में सिर्फ़ स्कर्ट-शर्ट-सॉक्स-शूज़ पहनने की ही अनुमति थी)? वो लड़की, सबकुछ चुपचाप सुनती, शायद ही मैंने उसे कभी किसी को जवाब देते सुना हो। क्या ऐसी लड़की ने अपनी शादी या आने वाले बच्चे का निर्णय ख़ुद लिया होगा? शायद नहीं।
ख़ैर, वक़्त बीता, बीतता ही गया। कल्पना की बेटी हुई और धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। वक़्त ने कल्पना को बहुत कुछ सिखा दिया था, बस वही धैर्यवान, साहसी और दृढ़निश्चयी होने के गुण उसने अपनी बेटी मेघना में विकसित किये। एक सबसे ज़रूरी बात जो उसने मेघना को सिखायी, वो थी, अपने निर्णय स्वयं लेना।
मेघना बचपन से एक होशियार लड़की थी, और अपनी सहनशील माँ का साथ पा कर वह आगे बढ़ती गयी। गणित और भौतिक विज्ञान में अच्छे अंक लेकर पास हुई और भारतीय वायु सेना में ऑफिसर ड्यूटी के लिये मेघना का चयन हो गया।
आज मेघना की शादी उसी के सहपाठी शान्तनु से है। कल्पना की आँखों में दो सितारे से चमक आये हैं, इससे पहले कि ये बूँदें लुढ़क जायें, उन्हें मेरे हाथों ने बढ़कर थाम लिया है।
कल्पना ये ख़ुशी के आँसू हैं, जाया मत करो इन्हें, अभी बहुत लम्हें देखने हैं इन्हें।