Tuesday, December 29, 2015

(25) "मायके आयी हुई लड़कियाँ"

(डिस्क्लेमर:- अग़र रोना आ जाये तो मुझे मत कहना, अपने रिस्क पर पढ़ना)
मायके आयी हुई लड़कियाँ,
माँ से लिपट रोती हैं ज़ार-ज़ार,
पिता से करती हैं,
आँखों ही आँखों में बहुत सा दुलार,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
बार-बार जाती हैं बाज़ार,
लाती हैं रंग-बिरंगी चूड़ियाँ काँच की,
खनखनाती हैं झिलमिलाती हैं हर बार,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
सोती हैं देर तक निश्चिन्त,
उठती हैं खाने की महक से,
अंतरमन में बसा लेती हैं खुशबू घर की,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
झाँकती हैं देर तक माँ की आँखों में,
चुनने लगती हैं उनमें बसे ख़्वाब,
बस वही जानती हैं सजाना उन ख्वाबों को,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
जानती हैं वापसी का दिन पक्का है,
धूप भर लेती हैं आँचल में अपने,
और रातों का लगा लेती हैं काजल,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
जी लेती हैं बचपन इक बार फ़िर से,
बन जाती हैं पापा की नन्ही गुड़िया,
और सीखती हैं खाना बनाना माँ से,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
मिल लेना चाहती हैं सबसे,
के ये मुलाक़ात आख़िरी हो जैसे,
यादें जमा करती हैं पल-पल बार-बार,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
सबकुछ छोड़ आती हैं दहलीज़ पर,
अपने संसार में जाकर जीती हैं,
जन्म लेती हैं फ़िर भी बार-बार,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
होती हैं बेहद ख़ूबसूरत कि,
उनके होंठों पर बसती है मुस्कुराहट,
आँखों में चमकते हैं सितारे कई,

मायके आयी हुई लड़कियाँ,
इनका यही अफ़साना है,
के ये संसार भी छूटे सदा,
वो संसार भी बेगाना है।
- अनामिका

Saturday, December 26, 2015

"सम्बन्धों की भावना"

वो भी एक दिसंबर था। उन दिनों मैं hostel में रहकर GRE और TOEFL के exam की तैयारी कर रही थी। क़रीब 6 महीने, लगातार इसकी तैयारी में ख़र्च कर दिये थे, बैरॉन्स, प्रिंसटन, नॉर्मन लुइस, ऑनलाइन GRE क्विज़ेज, मेमोरी कार्ड्स और पता नहीं क्या-क्या।
दिन में ऑफ़िस में काम करती, और सुबह-शाम-रात पढ़ाई और entertainment के नाम पर गाने।
GRE practice test के बारे में एक विश्वास(अंधविश्वास) था कि जितना score आप practice test में करते हैं वही score आपके final में भी आता है। इस विश्वास से डरी हुई मैं सोचती थी कि एकदम एकांत में ही टेस्ट लगाऊँगी, जब किसी भी प्रकार के disturbance की संभावना एकदम ना के बराबर होगी।
एक और बड़ा ही strong belief था मेरा, कि आराम करने वाले कुछ नहीं सीख पाते हैं, तो चाहें सर्दी हो या गर्मी, करना है तो करना है, ज़िद कहते हैं इसे  इसलिये, आधी रात को test लगाने बैठती थी, अपने प्रिय कंप्यूटर पर। GRE test के पहले प्रश्न से ही decide हो जाता है कि आपका graph ऊपर जायेगा या नीचे। अतः पहला प्रश्न सही होना सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। बहुत गंभीर क़िस्म का test है (कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगता था)
ऐसी ही एक सर्द रात को मेरी प्यारी रूममेट (रूम अलग़-अलग़ ही होते थे), को मुझ पर दया आयी और उसने मेरे लिये ग्लास भर चाय बनाकर मुझे दी। मेरे लिए यह बिल्कुल अप्रत्याशित और अनपेक्षित था, उस वक़्त ऐसा ही लगा मानो ज़न्नत मिल गयी है। रात के शायद 3 बजे होंगे। आज भी इतने वर्षों के बाद यह याद इतनी ताज़ा है कि जैसे कल ही की बात हो। वो अपनी घर-गृहस्थी में व्यस्त हैं मैं अपनी, लेकिन ऐसे ही छोटे-छोटे पलों ने जो हमारा सम्बंध जोड़ा वह आजतक क़ायम है। समय और दूरी सम्बन्धों की इस भावना को बदल नहीं पाये इसलिये मैं ईश्वर की बहुत आभारी हूँ, आज भी वो मेरे मन की बात बिना मेरे ज़ाहिर किये समझ जाती हैं।
काश कि हर सम्बंध ऐसा ही हो पाता।
- प्रिय गीता, तुम्हें समर्पित।

Friday, December 25, 2015

"बचपन की यादें और डॉक्टर्स"

जब मैं एक छोटी बच्ची थी, शरारतें करना और खेलना-कूदना यही मेरा पसंदीदा काम था। हर बच्चे का यही काम होता है।
इसी उछल-कूद के चक्कर में एक बार (5~6 वर्ष की उम्र में) मैं ईंटों की बनी क्यारी पर गिर गयी और दायीं आँख के पास चोट आ गयी। तुरंत ही मुझे डॉ. राज लूम्बा के क्लिनिक ले जाया गया। चोट को ठीक करने के लिये टाँके लगाने ज़रूरी थे और उस ज़माने में लोकल एरिया को सुन्न करने वाले ट्रीटमेंट भी नहीं होते थे। एक तो चोट लगने का दर्द और ऊपर से टाँके, करेला वो भी नीम चढ़ा। टाँकों के निशान तो ख़ैर समय के साथ धुँधले होते गये लेकिन यह याद इतनी गहरी है कि आज भी चलचित्र की तरह मानस-पटल पर अंकित है। ये तो बहुत बाद में पता चला कि हमारी यादों और हमारी भावनाओं का आपस में गहरा सम्बंध है, जिस बात से आपके भाव जुड़े हैं उसे भूलना कठिन होता है।
बहुत वर्षों के बाद एक बार फ़िर ख़ुद को उसी स्थिति में पाया। इस बार भी वैसी ही चोट लेकिन मुझे नहीं बेटे को आयी, उसकी भी वही उम्र और भौं (eye brow) पर 1 इंच का तिरछा कट लग गया, उसी तरह उछल-कूद और गिर कर पत्थर से टकराना। भाईसाहब किसी भी तरह डॉक्टर के पास जाने को तैयार न हों, किसी तरह बड़ी मशक्क़त के बाद इन्हें ले जाया गया। इस बार डॉ. संजय त्रिपाठी (लगभग हमारी उम्र के डॉ.) के ट्रॉमा सेंटर ले गए, आख़िर मानना पड़ेगा उनके धैर्य को, एक छोटे बच्चे को समझाते हुये, लोकलाइज़ सुन्न करने का इंजेक्शन भी लगा दिया और टाँके भी लगा दिये। इतनी बारीकी से उन्होंने ये काम किया कि मैं जितना भी आभार व्यक्त करूँ कम ही है। ये सारी प्रक्रिया मेरी आँखों के सामने ही OT में हुई और दिल तो मेरा मज़बूत था ही, क्योंकि ऐसी ही कारगुजारियाँ हम भी करके ही बैठे थे। अब ओखली में सिर दे ही दिया तो मूसल से क्या डर। ☺
जिसने कभी बचपन में खेलकूद वाली चोटें न खायी हों और टाँके न झेले हों वो इसे कितना समझेगा ये तो पता नहीं, लेकिन मैं जब कभी आईने में इस निशान को देखती हूँ तो बस यही ख़याल आता है कि ये गवाह है एक मासूम बचपने का। नहीं क्या ☺

Tuesday, December 22, 2015

(24) "अलख"

कितने ख़्वाब ग़ुमशुदा होंगे,
हसरतें कितनी खोई होंगी,
दिन कितने बोझिल होंगे,
कितनी रातें तुम रोयी होंगी,

ज़ख़्म अभी भी ताज़ा होंगे,
यादें कितनी न बासी होंगी,
मन कितनों के भारी होंगे,
कितनी रातें न सोयी होंगी,

औरत को इज़्ज़त न दे पायेंगे,
कैसे हिन्दुस्तानी कहलायेंगे,
न्याय समय पर नहीं हुआ,
फ़िर कैसी ये परिपाटी होगी,

प्रण लेकर ही बनाना होगा,
ऐसा समाज अब रचाना होगा,
हर लड़की दुर्गा का रूप बने,
अब हमें ही अलख जगानी होगी।

Saturday, December 19, 2015

(23) "बेख़ुदी"

ख़ुशियों का समंदर है,
या ग़म की ये गहराई है,
वादियों की ख़ामोशी है,
या मन की ये तन्हाई है,

तुमसे मिलने की ख़ुशी है,
या आलम-ऐ-बेरुख़ी है,
कुछ दूर तक तो साथ चल,
फ़िर इक ग़मग़ीन ज़ुदाई है,

तेरा नाम बड़ा ऊँचा है,
नाम लेना भी रुसवाई है,
ख़याल भर ही से तेरे,
कहीं शबनम मुस्कुराई है,

आग़ के दरिया में सम्हलना है,
या पार होना ही बेमानी है,
रूठ गयी है ज़िन्दगी तेरी,
या तेरा अंदाज़-ऐ-बेख़ुदी है।

Friday, December 11, 2015

"ख़ुशी कहाँ है?"

कल किसी ने इनबॉक्स में पूछा "ख़ुशी कहाँ है?", मैं मन ही मन मुस्कुरायी, अजी ये तो शाश्वत प्रश्न है, सदियों से ज्ञानीजन यही तो ख़ोज रहे हैं।
अच्छा प्रश्न है ना मित्रों, इसके उत्तर में कुछ बिंदु यहाँ रख रही हूँ, आप इस सूची को विस्तार दें। (आज प्रवचन देने के मूड में हूँ, मन न हो तो आगे मत पढ़ना)
1. ख़ुशी आपका प्रथम और जन्मसिद्ध अधिकार है।
2. ख़ुशी आपकी नितान्त व्यक्तिगत संपत्ति है, किसी दूसरे से इसका कोई ख़ास लेना-देना नहीं, जबतक आप स्वयं न चाहें।
3. ख़ुशी हाथ में उठाई हुई रेत के असंख्य कणों जितनी असीम है, बस इसे पकड़ने की कोशिश मत करना, सब सरक जायेगी, कुछ कण ही चिपके रह जायेंगे।
4. ख़ुशी जल की शीतलता में भी है और उसकी गर्माहट में भी, वक़्त-वक़्त की बात है।
5. ख़ुशी का आपकी बौद्धिकता, पद, प्रतिष्ठा, सम्पन्नता से कोई ख़ास लेना-देना नहीं है, सत्य से इसका सीधा सम्बन्ध ज़रूर है, आप जितना अधिक झूठ बोलेंगे उसी अनुपात में नाख़ुश रहेंगे। यदि आप ये समझते हैं कि आपके झूठ को पकड़ने वाली कोई मशीन ही ईज़ाद नहीं हुई आज तक, मतलब कि आप बहुत स्मार्ट हैं, तो भइया आपका दिल बहुत ज़ल्द इसका जवाब आपको देने वाला है।
6. ख़ुशी आपका चयन है, आपके पास दूसरा विकल्प भी नहीं, दुःख-तकलीफ़ की कहीं कोई कमी नहीं, आपकी सोच पर ही सब निर्भर करता है।
7. हर बार हर चीज़ आपके अनुसार नहीं हो सकती, लाख़ परहेज़ से रहिये, कुछ-न-कुछ तो लगा ही रहेगा ना, "टेक इट ईज़ी (Take it Easy)"।
8. Keep it Simple Silly (KISS) ये अपना लें तो काफ़ी हद तक ख़ुश रहा जा सकता है।
9. शांत मन ही ख़ुश रहता है, मन को शांत रखने के प्रयास करने न छोड़े। इस रास्ते पर मित्र हमारे सबसे बड़े साथी होते हैं, उतार-चढ़ाव सबकी ज़िन्दगी में आते हैं, आप अकेले नहीं।
10. अंतिम मार्ग जो ख़ुशी के रास्ते पर ले जाता है, वो "आराधना" का मार्ग है, या तो अपने कर्म से प्रेम करिये, या जिससे प्रेम हो उसके लिये कर्म करिये, तभी आप ख़ुश रह सकेंगे। ना ही आप प्रेम करना चाहते हैं, ना ही आप कर्म करना चाहते हैं तो ये प्रश्न पूछना बंद कर दीजिये कि, ख़ुशी कहाँ है? अरे भई ख़ुशी का मन, जहाँ मन किया चली गयी, कोई आपकी ग़ुलाम थोड़े न है।

Tuesday, December 8, 2015

भारत के शहरों में प्रदूषण

प्रदूषण आज के शहरी जीवन की सच्चाई है। क्या आपने कभी गंभीरता से सोचा है कि हम इस भयावह सच्चाई तक कैसे आ गये? (यह लेख भारत के शहरों के सन्दर्भ में है)।
भारतीय होने के नाते हम सब जानते हैं कि हमारे दैनिक जीवन में, हमारे खान-पान, रहन-सहन, भाषा-व्यवहार आदि में प्रतीकों का कितना अधिक महत्त्व है। आधुनिकता की अंधी-दौड़ हमें कहाँ ले आयी है। क्या आपको लगता नहीं कि यही सही समय है, जब कुछ पल ठहरकर दिशा निर्धारित की जाये?
भारतीय होने के नाते हमने, बरगद-पीपल पूजे (इनके औषधीय गुणों की छानबीन कीजिये, आप अवश्य सहमत हो जायेंगे कि इन्हें पूजना ही चाहिये), नाग को हमने देवता माना (नाग-पँचमी का त्योहार मनाया ताकि अकारण इनका वध न हो), भगवान शंकर के गले में सर्प, शीश पर चंद्र, और जटाओं में गँगा की अवधारणा की, (इन्हें पूजनीय बनाया ताकि हम इनके महत्व को सदैव याद रखें), खेतों पर हल चलाने से पहले उसकी पूजा की, घर बनाने से पहले "भूमि-पूजन" किया। गज (हाथी), वानर (बंदर), मूषक (चूहा), उलूक (उल्लू), मयूर (मोर), वाराह, मत्स्य, क्या-क्या गिनेंगे, हमने इन्हें प्रतीक बनाया ताकि हमें याद रहे। कमल-नारियल आदि वनस्पतियाँ भी हमारे प्रतीकों में सम्मिलित रहे। कभी आपने वास्तव में सोचा है कि ये प्रतीक, अंधविश्वास के प्रतीक न होकर हमारी पर्यावरण के प्रति जागरूकता को इंगित करते हैं।
आज भी हमें कहा जाता है कि सोकर उठने पर धरती पर पैर रखने से पहले, धरती माँ की चरण-वंदना करनी चाहिये, यह हमारी कृतज्ञता का द्योतक है या अंधविश्वास है, यह निर्णय आप स्वयं करें।
सुबह सबसे पहले अपने दोनों हाथों की हथेलियों को प्रणाम करना क्या इस बात का द्योतक नहीं कि हम कर्म-प्रधान सभ्यता हैं?
आज भी नदी में स्नान करने जाने पर नदी के जल को स्पर्श करके नदी को प्रणाम करते हैं, क्या हमें नदी का कृतज्ञ नहीं होना चाहिये?
यदि हम इस वैज्ञानिक सोच वाली संस्कृति के अंग हैं तो क्या कारण है कि आज भारत के शहर रो रहे हैं? भूमि (कचरा), वायु (धुँआ-धूल, कीटाणु), जल (विषाणु, केमिकल वेस्ट), भोजन (हर चीज़ में मिलावट), आकाश (अनेक प्रकार की तरंगें), जिन 5 तत्वों से हमारा शरीर निर्मित है, हर उस तत्व को हम सब ने मिलकर प्रदूषित कर दिया है। इसका सबसे बड़ा कारण हमारा "लालची स्वभाव" है। अभी हम एक विकासशील देश हैं, अभी हमारी जेबें इतनी नहीं भरी हैं कि हम हर स्तरीय वस्तु का उपभोग कर सकें, फलस्वरूप, हमारे देश में हर वस्तु " सेकंड या थर्ड ग्रेड" की ही आती है, फिर चाहें वो "टेक्नोलॉजी" हो, " केमिकल" हों, "इलेक्ट्रॉनिक" या "कॉस्मेटिक"।
स्तरीय चीज़ों को पाने के लिये हमारे प्रयास अभी भी नहीं हैं।क्या आपको लगता है कि आयातित चीज़ों पर भरोसा किया जाना चाहिये? क्या आप जो गाड़ियाँ चला रहे हैं उनके फ़िल्टर हानिकारक तत्वों को हवा में, और बाद में आपकी साँस में जाने से रोक रहे हैं?
आँखें खोलिये, देखिये अपने चारों ओर, कहीं ऐसा न हो कि कल आपका बच्चा आपसे सवाल करे और कहे कि सारी गंदगी तुमने ही विरासत में दी है मुझे।

(22) "बिसात"

ज़िन्दगी की बिसात पर,
ज़िन्दगी की बाज़ी क्या,
क्या होती है शोहरत,
होती है बर्बादी क्या,

ग़र मिल सके सुकूँ कहीं,
दो पल को ठहर जा,
किसी से थी मोहब्बत कभी,
उससे अब लड़ाई क्या,

समय का पहिया यूँ ही चले,
हर बात तेरे बस में नहीं,
कभी था इंतज़ार तुझे,
अब फ़िक़्र क्या रुसवाई क्या,

छू लेना है तुझको तेरा मकां,
फ़िर ज़ब्त क्या परेशानी क्या,
पानी है तुझको दौलत सच्ची,
अब अच्छाई क्या बुराई क्या।

Monday, December 7, 2015

(21) "चंद बातें दोस्तों से"

अपनी-अपनी दुश्वारियों से जूझते हम-आप सब,
कभी मिल बैठेंगे तो बतियाएंगे।

कुछ किस्से कहेंगे अपनों के, गैरों के,
गीत कुछ गुनगुनाएंगे।

ज़िन्दगी ख़ुदग़र्ज़ है, बुलाने पर नहीं आती,
मिलेगी जिस दिन, पकड़ बैठेंगे, मुस्कुरायेंगे।

दोस्तों का साथ और, अपनों की बात और,
कुछ जख़्म कुरेदेंगे, मलहम कुछ पर लगायेंगे।

मत समझना बड़े मज़बूत हो, ग़फ़लत में न जीना,
दिल के तार छेड़ेंगे तो, अश्क़ ढ़लक जायेंगे।

कहने का सलीक़ा हो तो, बातें भी फ़ूल बनें,
बताने से उसके, न जाने क्या-क्या मंज़र नज़र आयेंगे।

दिल से दिल मिल जाये, तो जीना आसान बने,
ग़ैरों में क़ूवत है मोहब्बत की, देखकर अपने भी शर्मायेंगे।

मत कर ऐहसान फ़रामोशी ऐ दीवाने इंसान,
उसको ही नहीं, एक दिन ग़म तुझको भी रुलायेंगे।

होगा हिसाब ज़िंदगी का तेरा भी, मेरा भी,
एक दिन फ़रिश्ते तुझको भी और मुझको भी, ले जाएंगे। 

Friday, December 4, 2015

(2E) "Life is Awesome"

Some pains are never explained,
Some pains did never pained,
Some goals are never accomplished,
Some goals have nothing to be gained,
Some judgments were never brought,
Some people were poorly taught,
Some roads were never traveled,
Some mountains were never climbed,
Some possessions were never acclaimed,
Some luxuries were never proclaimed,
Some resources were never tapped,
Some emotions were always trapped,
Some whispers were never said,
Some books were never read,
Some calls were never responded,
Some beauties were never appreciated,
Some babies were never born,
Some people did all the harm,
Some days were just spent,
Some days just like went,
Some mysteries were never resolved,
Some stories were never told,
Some thoughts were all the potential,
Some thoughts were always dead,
Some nights were all light up,
Some days were not even bright,
Some gardens had all the flowers,
Some gardens never got showers,
Some songs were never sung,
Some songs never came on tongue,
Some minds did see the light,
Some minds never get an insight,
Some lived the life to be old,
Some were old but lived a life,
Some were passing through your life,
Some swept you away with them,
Some people made you realize,
Some people let you summarize,
All "some" are the zest of life,
Don't you think, life is "awesome"?

Tuesday, December 1, 2015

(20) "पर्णपाती वन"

ओ पर्णपाती वन, 
क्या कहें तुम पर कविता,
कैसे करें गुणगान,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,

देखकर लगता है तुम हो,
निष्ठुर,नीरस,
निर्भय, निर्द्वंध,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,

सहना है तुमको,
सघन शीत औ हिमपात,
शेष है जीवन सुप्त,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,

क्यों है प्रतीक्षा तुमको,
भंगुर है जीवन,
अनवरत है चक्र,
होते हो तैयार,
ओ पर्णपाती वन,
ओ निर्मम,

तुम ही हो जीवनसार,
स्वयं में समाहित,
कण-कण में गर्भित,
समानुकूल प्रस्फुटित,
ओ पर्णपाती वन,
तुम ही हो मर्म।

Thursday, November 26, 2015

उच्च शिक्षा: क्या सबके लिये?

मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि उच्चशिक्षा के सम्बंध में कुछ प्रश्न पूछे जायें।
1. क्या वास्तव में उच्च शिक्षा का सुलभ होना देश की प्रगति के लिये उचित है?
2. क्या उच्चशिक्षा हेतु भारत सरकार द्वारा जितना भी धन व्यय किया जाता है वो प्रतिफल में परिवर्तित होता है? (Is the "return of money" equally proportional to the "money spent" in developing the infrastructure for higher education system in India?)
3. क्या कारण हैं कि उच्च शिक्षा रोज़गारप्रद नहीं है?
4. क्या उच्च शिक्षा को जीविकोपार्जन से जोड़ा जाना उचित है?
5. क्या विश्वविद्यालयी शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र-छात्रायें वास्तव में उस शिक्षा को प्राप्त करने योग्य हैं?
6. क्या विश्वविद्यालयों में आने वाले छात्र-छात्रायें स्वयं अपनी इच्छा से, ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं?
7. क्या छात्र-छात्रायें मजबूरी व घरवालों के दबाव में विश्वविद्यालयी शिक्षा का हिस्सा बन रहे हैं?
8. क्या छात्र-छात्रायें मात्र एक फ़ैशन के रूप में और "कुछ नहीं से कुछ अच्छा" के विचार से महाविद्यालय आते हैं?
9. क्या भारत जैसा देश इस प्रकार की फ़ैशनेबल शिक्षा का वहन कर सकता है?
10. क्या ये अच्छा न हो कि जिन लोगों के लिये सरकारी नौकरियों में पद/स्थान आरक्षित हैं उसी वर्ग विशेष के लोग महाविद्यालयों में अपना समय और धन व्यय करें। बाकी बचा-खुचा वर्ग 12th के बाद की पढ़ाई में वह कार्य सीखे जो उसके लिये आगे जाकर जीविकोपार्जन में सहायक सिद्ध हो?

Tuesday, November 17, 2015

अवसर ऋण

अवसर ऋण एक ऐसा नाम है जो मेरे मन की उपज है। जो भी अर्थशास्त्र की सामान्य जानकारी रखते हैं वह "अवसर लागत (Opportunity Cost)" टर्म(पद) से परिचित होंगे। एक बहुत ही साधारण से उदाहरण द्वारा अवसर लागत के एक पक्ष को समझा जा सकता है। मान लीजिये कि आपके पास नौकरी के दो अवसर हैं, दोनों में से आपको एक अवसर का चुनाव करना है। जिस अवसर को आप चुन लेते हैं उसके बदले में दूसरे अवसर से प्राप्त होने वाले अनेक लाभ आप खो देते हैं, यह नुकसान ही "अवसर लागत" है। इसका ठीक-ठीक मापन बहुत कठिन कार्य है क्योंकि बहुत से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष नुकसान इसमें शामिल होते हैं।
इसी आधार पर मैंने "अवसर ऋण" टर्म निकाला है। हमारे आस-पास समाज में हमारे अनेक समवयस्क ऐसे हैं जिन्हें अवसर नहीं मिले क्योंकि वो अवसर हमें मिले। हमारे जन्म, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, जीविकोपार्जन इत्यादि, जीवन के अनेक सोपानों पर किसी न किसी ने वो अवसर खोया है जो हमें मिला है। इस लिहाज़ से हम पर हर उस समवयस्क का ऋण है जिसे सामान अवसर नहीं मिला। इस बात के अनेक कारण हो सकते हैं कि उन्हें अवसर क्यों नहीं मिले, लेकिन इससे भी यह तथ्य झुठलाया नहीं जा सकता है।
कई बार मैं उदास होना चाहती हूँ, जीवन से निराश होना चाहती हूँ लेकिन इस ऋण का बोझ मुझे ऐसा करने नहीं देता।भले ही हम सब अपने-अपने स्तर पर आगे बढ़ने के लिये संघर्षरत हैं, हमारे जीवन के लक्ष्य भिन्न-भिन्न हैं, प्राथमिकतायें भिन्न हैं, समस्याऐं भिन्न हैं, परिस्थितियाँ भिन्न हैं, फिर भी यह तथ्य वहीं का वहीं है।
अगली बार निराश या उदास होने से पहले सोचियेगा, कि यह ऋण उतारे बिना मुक्ति नहीं है।

Friday, November 6, 2015

(19) "तुम हो"

अंतहीन आकाश के विस्तार में तुम हो,
सागरों की अतल गहराईयों में तुम हो,
पर्वतों के हृदय की कोमलता में तुम हो,
जल-नृत्य करतीं सुनहरी किरणों में तुम हो,

तितली के पैरों से चिपके पराग में तुम हो,
पुष्पों में सुगंध और पल्लवों के रंग में तुम हो,
काँपती हथेली की झुर्रीदार सलवटों में तुम हो,
नन्हे शिशुओं की अकारण मुस्कानों में तुम हो,

मेरे ईश्वर, जब भी बुलाऊँ, मेरे साथ में तुम हो,
मित्र-सखा, माता-पिता, कण-कण में तुम हो।

Wednesday, November 4, 2015

"अहिंसा"


क्या अहिंसा का अर्थ मात्र हिंसा के अभाव से लिया जा सकता है या इसे इससे अधिक व्यापक अर्थ में समझने की आवश्यकता है? है, क्योंकि, हर स्थान पर शान्ति दिखने को ही शान्ति है ऐसा नहीं माना जा सकता।

शान्ति से सम्बंधित एक बहुप्रचलित मंत्र है जोकि यजुर्वेद से लिया गया है, निम्नप्रकार है:-

ॐ द्यौ शान्तिरन्तरिक्ष: शान्ति: पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्मा शान्ति: सर्वः शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति: ॐ॥
इस मंत्र का अर्थ एवं तात्पर्य सम्पूर्ण जगत में शांति स्थापित करने हेतु है।

यदि अपने चारों ओर नज़र दौड़ाइये तो आप पायेंगे कि हर व्यक्ति की अपने जीवन में एक ही खोज है, और वह खोज है शांति की खोज। हर व्यक्ति न जाने कब से इस खोज में लगा हुआ है और खोज है कि पूरी होने का नाम ही नहीं लेती। अब प्रश्न यह उठता है कि क्यों यह खोज अनवरत बनी हुई है? कोई ऐसा नहीं मिलता जो अपनी खोज पूरी करके सुस्ताता हुआ मिला हो। खोज पूरी क्यों नहीं होती?

खोज पूरी नहीं होती है और अनवरत बनी हुई है क्योंकि, हम अहिंसा को नहीं जानते हैं। अहिंसा को जाने बिना शांति की खोज कभी पूरी नहीं हो सकती।

अफ़सोस की बात है कि पश्चिमी जगत जिस योग को गले से लगाये बैठा है, उसके अनेक लाभ ले रहा है, और ले चुका है, हम भारतवासी उसके मूल तत्व से ही अनभिज्ञ हैं। स्पष्ट कर दूँ कि, योग का अर्थ अनेक प्रकार के आसान, प्राणायाम या मुद्रायें नहीं है। योग एक जीवन-पद्धति है जिसका आधार अहिंसा है। इस अहिंसा का आरम्भ आपकी स्वयं पर अहिंसा से होता है। हममें से अनेक संवेदनशील लोग अहंकारवश, (जी हाँ, अहंकारवश, क्योंकि बहुत सी घटनाओं पर मानव का कोई नियंत्रण ही नहीं होता है, परन्तु मानव स्वभाववश हर प्रक्रिया पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता है) अनेक प्रकार की घटनाओं के लिये स्वयं को उत्तरदायी समझते हैं और लम्बे समय तक स्वयं को क्षमा नहीं करते, दूसरे शब्दों में कहूँ तो ये कि, ख़ुद को ज़िम्मेदार मानकर बहुत सी घटनाओं के लिये ख़ुद को दोषी समझते रहते हैं, ख़ुद से नाराज़ रहते हैं, और यही नाराज़गी बहुत सी शारीरिक एवं मानसिक समस्याओं के रूप में प्रकट होती है। इन बीमारियों (व्याधियों) के इलाज़ के लिये आप डॉक्टर्स के चक्कर काटते हैं, लेकिन नतीज़ा सिफ़र(शून्य) मिलता है, आपके सारे परीक्षणों (tests) के परिणाम(reports) सही आते हैं। अब आप और आपका डॉक्टर समझ नहीं पाता है कि आख़िर समस्या की जड़ कहाँ है। मुश्क़िल है जड़ तक पहुँचना, क्योंकि वर्तमान चिकित्सा पद्धति लक्षणों का इलाज़ करने के लिये विकसित हुई है, कारणों का इलाज़ करने के लिये नहीं। 

यदि स्वस्थ रहने की आपकी इच्छा है तो अहिंसा ही वह मूलभूत औषधि है, जिसका आपको प्रयोग नहीं बल्कि पालन करना है। मृत्यु तो अंतिम सत्य है ही, स्वयं को क्षमा करके भी और स्वयं पर क्रोधित रहते हुये भी।

यही अहिंसा की मूल अवधारणा है, स्वयं को क्षमा करो और दूसरों को भी।

सरोगेसी: किराये की कोख़

सरोगेसी यानि किराए की कोख़ पर बहुत कुछ पढ़ा, देखा और सुना, और अंत में जाकर मैं इसी नतीजे पर पहुँची हूँ कि ये स्त्री शरीर के साथ विज्ञान का एक खिलवाड़ है और मैं इस खिलवाड़ के विरोध में हूँ।
अब, बहुत से लोग, जो सरोगेसी के पक्ष में हैं, उनसे निवेदन है कि वो अपना समय मेरे विचारों को आगे पढ़ने में न नष्ट करें।
बिन्दुवार अपने विचार रखने का प्रयास करूँगी:-
1. सरोगेसी के बारे में सबसे ख़तरनाक विचार, जिसके द्वारा स्वस्थ, पढ़ी-लिखी परन्तु आर्थिकरूप से असमर्थ महिलाओं की कंडीशनिंग की जाती है वो ये है कि, सरोगेसी एक बहुत "पुण्य" का काम है, जिसे करके वो किसी दम्पति को ख़ुशी देने जा रही हैं, माँ न बन सकी स्त्री को मातृत्व सुख देने जा रही हैं। अब आप सोचेंगे कि ये ख़तरनाक विचार क्यों हो गया, ये तो बहुत अच्छी सोच है। तो मैं कहूँगी, बिल्कुल अच्छी सोच है यदि, सरोगेसी का निर्णय लेने वाली महिला आर्थिकरूप से आत्मनिर्भर है (उसे और रुपयों की ज़रुरत नहीं है) तो, ये विचार, अपनी कोख़ का " दान" सर्वथा उचित है। पर समस्या यही है हमारे समाज की, कि हमने "पाप" और "पुण्य" के बड़े-बड़े मानदण्ड बना रखे हैं। यदि कोई महिला सहवास करके गर्भिणी हो जाती है, किन्ही विशेष परिस्थितियों में, तो वो पापी होती है, उसके अलग़ पैमाने, संतान भी अवैध हो गयी फिर। परन्तु यदि वो सेरोगेसी के लिए अपनी कोख़ किराये पर दे देती है, तो वो पुण्यात्मा हो गयी। (यदि इस पूरी प्रक्रिया में धन/मुद्रा न सम्मिलित हो तो शायद इसे पुण्य माना भी जाये, मैं बिल्कुल ऐसा नहीं मानती)
2. सरोगेसी से प्राप्त धन क्या उस महिला को मिलता है जिसने नौ-दस महीने एक जीव को गर्भ में रखा। उत्तर नकारात्मक ही मिलेगा, क्योकि, आर्थिक कठिनाई, जिसके कारण महिला इस प्रक्रिया के लिए राज़ी हुई थी, वह आर्थिक कठिनाई अकेले महिला की नहीं अपितु पूरे परिवार की है। यदि आर्थिक कठिनाई के कारण महिला को अपनी कोख़ किराये पर चढ़ानी पड़ी तो फिर शरीर बेचना भी वैध होना चाहिये।
3. क्या आप मानते हैं कि गर्भावस्था मात्र नौ-दस महीने की होती है? प्रसव के बाद क्या स्त्री में शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक बदलाव नहीं आते? क्या सरोगेसी इस सब से अछूती है?
4. गर्भावस्था के पूरे काल में कितनी अप्रत्याशित समस्यायें आ सकती हैं। स्त्री की मृत्यु भी हो सकती है। क्या सरोगेसी इन सबसे ऊपर है?
5. आज तक कितनी सक्षम स्त्रियों ने, जो स्वयं डॉक्टर हैं, और सरोगेसी के पक्ष में हैं, सरोगेसी के लिये अपनी कोख़ उधार दी है? बिना स्वयं इस प्रक्रिया का हिस्सा बने, इसके पक्ष में होना आपकी ईमानदारी पर प्रश्न उठाता है। वो बात अलग़ है जब आप स्वयं ही किसी और की सरोगेसी का इंतज़ार कर रही हों।
6. सरोगेसी किसी भी प्रकार से महिला सशक्तिकरण नहीं है। भविष्य में महिलायें यह भी कह सकती हैं कि मैं तो पैसा बना सकती हूँ क्योंकि मेरे पास एक कोख़ है जिसे मैं किराये पर चढ़ा सकती हूँ। मेरा शरीर ही मेरी संपत्ति है।
7. अपने ही बीज का पौधा क्यों चाहिये? इसलिये क्योंकि हम समर्थ हैं, क्योंकि हम पैसा देकर कोख़ उधार ले सकते हैं, क्योंकि हम अपनी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि हमें और चाहिये।
8. यदि किसी स्त्री की माँ, सासू-माँ या कोई और शुभचिंतक ऐसी सहायता करने में समर्थ है, और करता है, तो मैं इसे अनुचित नहीं मानती, पर क्या ऐसा होता है?
यदि आपके पास इनके विपरीत तर्क हैं और उनसे मैं सहमत हूँ तो मैं संशोधन अवश्य करूँगी।

Thursday, October 29, 2015

(1E) "One Day"

One day,
When everything will be dirty,
We are learning to clean,

One day,
When there will be no food,
We are learning to cook,

One day,
When you will destroy all,
We are learning to create,

One day,
When all you have is hatred,
We are learning to love,

One day,
When you will abolish all dwellings,
We are learning to make,

One day,
When there will be no water,
We are learning to shed tears,

One day,
When smile will be snached,
We are learning to make-up,

One day,
When everything will be ugly,
We are learning to embroider,

One day,
When you all have wounds,
We are learning to stitch,

One day,
When there will be no life,
We are able to procreate,

Yes,
We are feminine,
And we know,
How to create from no where.

Wednesday, October 28, 2015

(18) "सखी री"

"सखी री"
अंतस को मत बँटने दो,
मनपाश को कुछ खुलने दो,
मुक्त उड़ो अब नील गगन में,
पँखों को स्वयं फैलने दो,

ज्वाला अंतर की बुझ जायेगी,
दिया ज्ञान का जलने दो,
संबंध पाश को खुलने दो,
मन को अब मुक्त विचरने दो,

साथ सत्य का सदा ही देना,
अब झूठ की परतें खुलने दो,
पीड़ा अंतर की मिट जायेगी,
स्वयं को समर्पित होने दो,

कितना भागोगे, लड़ोगे कितना,
कर लो थोड़ा आराम अहो,
मत करो संघर्ष अब आज सखी,
कल के लिये भी कुछ रहने दो।

(17) "तुम"

मेरी सिन्दूरी शाम भी तुम हो,
मेरी पीली उजास भी तुम हो,
मेरी सुनहरी सुबह भी तुम हो,
मेरी चाँदनी रात भी तुम हो,

तुम बिन जीना सह पाऊँ कैसे,
तुम बिन अब मैं रह पाऊँ कैसे,
बालक बनकर आये हो तुम,
तुमको व्यक्ति बनाऊँ कैसे,

जबतक तुमको जाना न था,
मानो कुछ पहचाना न था,
हर कर्म समर्पित ईश्वर को,
स्वयं विधाता बन जाऊँ कैसे,

है यही पहचानी उधेड़-बुन,
हरपल गुनता रहता है मन,
मेरी इच्छा तुम भले न मानो,
परहित अवश्य पहचानो तुम।

Thursday, September 17, 2015

"इतिहास की परीक्षा"

ये कविता मुझे वर्षों से याद है पर इसके रचयिता का नाम मुझे पता नहीं है। आपमें से किसी को इसकी जानकारी हो तो अवश्य बताइयेगा।
"इतिहास की परीक्षा"
इतिहास की परीक्षा थी उस दिन,
चिंता से हृदय धड़कता था,
जब से जागा सुबह तभी से,
बायाँ नयन फड़कता था,
जो उत्तर मैंने याद किये,
उनमें से आधे याद हुये,
बाकी स्कूल पहुँचने तक,
यादों में बर्बाद हुये,
जो सीट दिखायी दी खाली,
उसपर ही जमकर जा बैठा,
था एक निरीक्षक कमरे में,
आया झल्लाया ऐंठा, बोला,
रे रे, क्यूँ आया करके देरी है,
तू यहाँ कहाँ पर आ बैठा,
उठ जा यह कुर्सी मेरी है,
मैं उचका एक उचक्के सा,
मुझमें सीटों में मैच हुआ,
अकरा-टकरा कर कहीं,
एक कुर्सी के द्वारा कैच हुआ।
पर्चे पर मेरी नज़र पड़ी तो,
सारा बदन पसीना था,
फ़िर भी पर्चे से डरा नहीं,
क्योंकि यह मेरा ही सीना था,
कॉपी के बरगद पर मैंने,
कलम कुल्हाड़ा दे मारा,
घण्टे भर के भीतर कर डाला,
प्रश्नों का वारा न्यारा,
अक़बर का बेटा था बाबर,
जो वायुयान से आया था,
उसने ही हिंदमहासागर,
अमरीका से मँगवाया था,
गौतम जो बुद्ध हुये जाकर,
वे गाँधी जी के चेले थे,
दोनों बचपन में नेहरू के संग,
आँख-मिचौनी खेले थे,
होटल का मालिक था अशोक,
जो ताज़महल में रहता था,
ओ अँग्रेज़ों भारत छोड़ो,
वह लालकिले से कहता था,
झाँसा दे जाती थी,
ऐसी थी झाँसी की रानी,
रोज़ अशोक के होटल में,
खाया करती थी बिरयानी,
ऐसे ही चुन-चुन कर मैंने,
प्रश्नों के पापड़ बेल दिये,
उत्तर के ऊँचे पहाड़,
टीचर की ओर ढ़केल दिये,
टीचर जी बेचारे,
इस ऊँचाई तक क्या चढ़ पाते,
लाचार पुराने चश्में से,
इतिहास नया क्या पढ़ पाते,
उनके बस के बाहर मेरा,
इतिहासों का भूगोल हुआ,
ऐसे में फिर क्या होना था भाई,
मेरा नंबर तो गोल हुआ।
(इसकी मूल कविता के रचयिता थे, ओमप्रकाश आदित्य, एवं कविता का शीर्षक था "इतिहास का पर्चा", मौलिक कविता का स्वरुप इससे भिन्न है)

Saturday, August 29, 2015

(16) "रक्षा-बंधन"

हमको लगता सबसे प्यारा,
भाई-बहन का रिश्ता न्यारा,

भाई बड़ा हो छोटी बहना,
बस उसके अब ऐश क्या कहना,
मनमानी चीज़ें मंगवाये,
रूठ जाये तो भाई मनाये,

बड़ी बहन हो छोटा भाई,
हर ग़लती पर डाँट लगाई,
नये-नये पकवान खिलाये,
भाई पर कोई आँच न आये,

जुड़वाँ हुये तो साथ ही खेलें,
मम्मी-पापा फूले न समायें,
कठिन प्रक्रिया इनका पालन,
एक लाड़ली, दूजा लालन,

घर में जब हों भाई-बहनें,
कभी कहीं न अकेले जायें,
लड़ते-झगड़ते, रूठें-मनायें,
मित्र बनें, दिल खुलते जायें,

रक्षा-बंधन है प्रेम का बंधन,
रिश्ते दिल से निभते जायें,
सामाजिकता का पाठ-पढ़ाते,
त्योहार हैं बस प्रतीक हमारे।

Tuesday, August 25, 2015

(15) "वर्षा ऋतु"

हरहर हरहर चले हवारा,
मौसम का कैसा है नज़ारा,
गहरे काले बादल छाये,
तूफां का अंदेशा जगाये,
मन मतवाला पँछी बनता,
बिना डरे ही गाता जाता,
ओ बादल आकाश के राजा,
थोड़ी वर्षा इधर करा जा,
हरी भरी चूनर सज जाये,
धरती माता ख़ुश हो जाये,
तपे हुये तन-मन खिल जायें,
लोग चाय और पकौड़ी खायें,
वर्षा ऋतु है बड़ी सुहानी,
एक बरस के बाद है आनी,
जीभर याद बसा लो मन में,
फिर ना कहना भीग न पाये।

Friday, July 31, 2015

"Tanu Weds Manu returns: Movie Review"

I never wrote a movie review just because I watch movies for entertainment, but having seen so many posts on Facebook, about the movie "Tanu Weds Manu Returns", I thought of writing my views on the said movie.

There are many characters those are the threads of the movie carpet, here I want to talk about few of them:-

1. Tanu (Tanuja Trivedi):- She is the kind of vagabond woman who wants to live a free life before marriage and after marriage. She is liked by many men as a beloved, just because she is passionate and free spirited.This is one reason she is liked by Manu (Manoj Sharma), Raja Awasthi and Chintu ji (Arun Kumar Singh), also she is liked by Pappi Bhaiya. But all of them are afraid to keep her, because she is difficult to be kept in a confined surrounding, She just follows her heart, an emotional and a brainless character. That makes her life hell after being married for 4 years. She has no idea that there is a difference in being a "beloved" and being a "wife". Even after 4 years she does not know what is the meaning of the word "responsibility".

2. Datto (Kusum Sangwan):- She is focused and goal oriented girl, who is neither highly intelligent nor beautiful, but sensible enough to understand her surroundings. She gets involve in the affair and wants to grab the only opportunity of love, ignoring the clear tell-tale love story of Tanu and Manu. She just realizes the reality at the right time, and she gets rid of this chaos. She ignores in the beginning, that Manu Sharma is not divorced yet and only looking for a rebound relationship, which eventually lead a life of hell for her. My heart goes for this strong woman who becomes weak on the plight of love (pseudo love). She deserves a much better person than Manu Sharma. Someone who truly appreciate her capabilities.

3. Manu (Manoj Sharma):- A weak character of the movie, who is incapable of keeping his wife whom he loved and took for granted after a year of marriage. He is not clear in his decision to divorce his wife. He goes and asks his father, then he goes to the court, there also he is not clear, what actually he wants to do, the Lawyer suggests him to send just a notice, not a divorce notice. After sending the notice and the letter to Tanu he waits for a return call from her. He is so egoist that after receiving a divorce notice (false notice) he does not bother to talk to his wife. Then, he goes after Datto and says, he will prove to be a good husband, How????? :) Lastly, all his problems are either resolved by Raja Awasthi or Datto or Pappi Bhaiya. The kind of maturity expected from this character was missing. At one instance, Tanu asks him, Why did he change? She was like this always. He is that one-stupid-lucky-guy who gets the best piece of the cake without doing anything effectively.

4. Raja Awasthi:-A local less-educated "Thekedaar", who understands very basic principals of life, loved Tanu, and he still loves her, but on the other hand, he knows that Tanu loves Manu Sharma, and therefore he tries to help (both) to put back their life on track. In fact he scolds Manu Sharma at few instances to take the right step at the right time.

5. Chintu ji (Arun Kumar Singh):- This is the most lecherous character of the movie, but I appreciate the acting. It really made me feel like picking this person in public and thrash him to the ground so that he forgets that all women are his property. Such a shameless and characterless person he is.

Wednesday, July 22, 2015

(14) "जीवन"

उल्टे ही गिरे आकर धरती पर,
उल्टा ही चित्र दिखा दर्पण में,
उल्टा ही सँसार बना नयनन में,
उल्टा ही विज्ञान पढ़ा बचपन में,

सूर्य उदय होता पूरब से,
अस्त हुआ पच्छिम में,
आभासी क्षितिज, आभासी सँसार,
हर वस्तु है कम्पन में, गति में,

परिवर्तन चराचर में,
हम अचरज में, ठिठके,
चाहे मन थामना, किसको,
निहारता अपलक, अवलम्ब,

छोड़ना जटिल है, प्रक्रिया कठिन,
डिगना अहं का नहीं सरल,
मन विकल, पीता गरल,
त्याग देह, जाता निकल,

जीवन आलोड़न, मध्य शिव बिंदु दो,
प्रारंभ जिसका अंत से,
जन्म घटना, होती घटित,
युगों-युगों से, युगों-युगों तक,

न समझना इसे, सीधा है या उल्टा,
जीवन बस जीते जाना है,
क्या जी का कर पाना है,
जीवन बस जीते जाना है।

Friday, June 26, 2015

(13) "बारिशें"

बारिशें,
भिगोयें सारा आलम,
भिगोयें धरती औ गगन,

बारिशें,
महकाएँ अपनी ख़ुश्बू से,
मेरा मन तेरा मन,


बारिशें,
न जाने कहाँ से आयें,
शीतल कर जायें पवन,

बारिशें,
अनोखे अनकहे प्रेम की,
सफल कर जायें जीवन।

Thursday, June 4, 2015

Conditional and Unconditional

It is a relationship that is conditional, not love.
It is a relationship that is conditional, not support.
It is a relationship that is conditional, not trust.
It is a relationship that is conditional, not respect.
It is a relationship that is conditional, not feelings.
.......but a relationship is based on love, support, trust, respect and feelings.

Wednesday, June 3, 2015

चंद अशआर:-

१.
हँसना-रोना भी गया, मुस्कान भी,
हाथ खाली रह गए, और झोली भी।

२.
याद करने से भी डर जाते हैं हम,
तकलीफ़ न हो हिचकियों से उन्हें।

३.
इश्क़ का सबक़ तो डूबकर मिला,
गिरे हुए से पूछते हो, अब करते हो क्या।

४.
ज़िन्दगी की सब शोख़ियाँ नसीब हों तुझे,
दुआ ही देते हैं, अब ग़िला तक बचा नहीं यहाँ।

५.
सज़ा-ऐ-गुनाह से, अब डरते नहीं हैं हम,
अर्ज़ी-ऐ-वफ़ा, लगा बैठे हैं सज़दे में महबूब के।

६.
जो जल्दी में चले जाते हैं, उन्हें ग़म बड़े लगते हैं ज़माने के,
थोड़ा ठहर के देखें तो हर जगह, मौक़े हैं ख़ुशी कमाने के।

७. 
ज़िन्दगी की राहें हैं मुश्क़िल, नाज़ुक सा ये दिल,
भूल कर उनको, सोया ही रहे, तो सम्हल सके,
नादान बच्चा सा दिल, पूछता है कहाँ हूँ मैं कहाँ,
कहती है ज़िन्दगी दिल से, तू जहाँ मैं भी हूँ वहाँ।

८.
दुश्मन-ऐ-जाँ मना ले जश्न कितने भी,
दुआ-ऐ-दोस्त की हमें कमी तो नहीं।

९.
बात तक करने का, जिन्हें नहीं है शऊर,
आँखों को पढ़ने की, उनसे रखते हो उम्मीद,
बड़ी बेइंसाफी है जनाब, जाने उसे दीजिये,
वक़्त सब सिखा देगा, एक मौका तो दीजिये।
स्वर्णिम और मेरी कल की बात-चीत (जिसने मुझे सोचने पर मजबूर किया):-
स्वर्णिम ने बताया, "मम्मा,स्कूल से आते समय आज मुझे वो फिर से दिखा।"
मैंने पूछा, "कौन?"
स्वर्णिम का उत्तर,"वही होमलेस मैन। और एक बालक(स्वर्णिम का सहपाठी) ने कहा कि पुलिस इसे पकड़ती क्यों नहीं है?"
मैंने कहा, "हाँ, पुलिस को उसे रिमांड होम/ करेक्शन होम में रखना चाहिये। कम से कम उसे खाना तो मिलेगा"
स्वर्णिम का कथन, "पुलिस उसे क्यों पकड़े? आखिर उसका अपराध क्या है ? क्या ये अपराध है कि उसके पास घर नहीं है ?"
मैंने तर्क दिया, "शायद वो बीमार हो, शायद वो पागल हो (हमने कई बार उसे कूड़े में से खाना और दूसरी चीज़ें ढूंढते देखा है, पर दिन के समय वो इस इलाके में नहीं दिखता, पता नहीं कहाँ चला जाता है)"
स्वर्णिम का उत्तर, "नहीं मम्मा, वो पागल नहीं है, रेड लाइट के सिग्नल पर रुक जाता है, लाइट ग्रीन होने पर ही रोड क्रॉस करता है"
मैंने बात आगे बढ़ाई,"तुम्हारे विचार से ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिये?"
स्वर्णिम ने सुझाव दिया, "यहाँ की सरकार को ऐसे लोगों के लिये, जिनके पास घर और पैसे नहीं हैं, शेल्टर-होम बनाने चाहिये"
(मुझे याद आ गये भारत के वो असंख्य रेलवे स्टेशन जो इन जैसे निराश्रित लोगों के घर हैं, सर्दी-गर्मी-वर्षा से बचने के शरण-स्थल हैं) घर-भोजन-रिश्तों की अहमियत बढ़ जाती है जब आप किसी ऐसे इंसान से रूबरू होते हैं।

कवियों और लेखकों की श्रेणियाँ

कुछ समय पहले तक "कवियों और लेखकों" से मेरा मन उचाट हो गया था, और एक धारणा बन गयी थी कि इनकी कई श्रेणियाँ होती हैं।
पहली एवं उत्कृष्ट श्रेणी:- वे रचनाकार जो ईमानदारी से विशुद्ध लेखन करते हैं, निडरतापूर्वक "स्व" को रूप देते हैं, शायद ऐसे ही रचनाकारों की रचनायें कालजयी होती हैं।
दूसरी श्रेणी:- वे रचनाकार जो अर्थशास्त्री होते हैं, बाज़ार की क्रियाओं के अनुरूप लेखन करते हैं। माँग और पूर्ति के नियम से भली-भाँति परिचित होते हैं।
तीसरी श्रेणी:- वे रचनाकार जो किसी भी प्रकार निष्पक्ष नहीं होते हैं, अर्थात किसी न किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं।
चतुर्थ श्रेणी:- खिचड़ी होते हैं, या कहें कि सर्वगुणसंपन्न होते हैं।

कुल मिला कर निष्कर्ष ये निकला कि रचनाकार चाहें किसी भी श्रेणी में आयें, इनका साहसी होना पहली अनिवार्यता है, क्योंकि जो साहसी ही नहीं वो "स्व" को रूप कैसे प्रदान कर सकता है? ये सारा जीवन इसी "स्व" के रूपांतरण हेतु ही तो है, अन्यथा इसका क्या प्रयोजन है?
[पढ़ने-लिखने की आशा पुनः जाग्रत हो गयी है]

Friday, May 29, 2015

अच्छा स्वास्थ्य और नशा

अच्छा स्वास्थ्य सबसे बड़ी स्वतंत्रता है क्योंकि अच्छे स्वास्थ्य वाला व्यक्ति आत्मनिर्भर होता है, अतः किसी भी प्रकार का नशा आपकी इस सबसे बड़ी और पहली स्वतंत्रता के लिये बाधा है। इससे दूर रहना ही स्वतंत्र होने का द्योतक है। आप तब अपने को स्वतंत्र नहीं मान सकते, जब आप "शौक़" की किसी भी वस्तु को ख़रीद सकने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं, आप सही मायनों में तब स्वतंत्र हैं, जब आप ये बुद्धि-विवेक अर्जित कर लेते हैं कि आपके स्वयं के लिये क्या उचित है, और आप वास्तव में चाहते क्या हैं। जब-तक आपके विचारों में ये शुद्धता नहीं आ जाती है, तब-तक आप किसी न किसी चीज़ के ग़ुलाम बने ही रहेंगे, नशा क्या बड़ी चीज़ है। चीज़ें अपने शुद्ध रूप में बुरी नहीं होतीं, उनके प्रयोग के लिये क्या भावना कार्य करती है वही मुख्य है।

"नशा शराब में होता तो नाचती बोतल"

शिकंजी या लस्सी तो गर्मी से राहत देती हैं, भारत जैसे गरम देश में शराब की ज़रुरत मौसम के किस हिसाब से है मुझे समझ में नहीं आता, ख़ैर ये व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का विषय अवश्य है। यदि ये आवश्यकता है, तो अवश्य इसकी पूर्ति होनी चाहिये, परन्तु यदि ये मात्र "दिखावे का उपभोग (Conspicuous Consumption)" है, तो इसके प्रयोग को किसी भी रूप में बढ़ावा तो नहीं दिया जाना चाहिये। हमारी पीढ़ी को इस पर विचार करना चाहिये।
[नशे से तात्पर्य=सभी प्रकार के नशे, कोई भी ऐसी चीज़ जिसके प्रयोग से रोके जाने पर आपको क्रोध आता है]

Thursday, May 21, 2015

Imagination Vs Reality (A story needs both)


[Imaginatiin]
She: I'm fat.
He: No, you are not.
She: Everyone ask me to lose my weight.

He: They are jealous baby.
She: You don't know anything.
He: I know you more than they do, they are blind.
She: I think you are, not them..
He: Babe, I have seen you dressed 

 super nice, I've seen you
in school uniform, I've seen you
with hair tied, chilling with
no makeup on, I've seen you cry,
smile, laugh, mad, I've seen
you sleeping, hyper, awake...
You are always so beautiful to
me, always perfect..and you
say I don't see you clearly? :')
She: *Hugs* I Love you.
He: I Love you More.
She: Why do you care so much ?
He: I Care Because I Love You. 


[Reality]
She: I am fat.
He: hmm long pause....

yes, you are and I have been telling you for years but you just don't do anything and therefore I have stopped telling you. Every time I tell you the truth I get into trouble so I avoid talking to you.

Wednesday, May 20, 2015

(1) "सावित्री (मेरी पहली कहानी)"

पाँच बहनों में सबसे ख़ूबसूरत ब्राह्मण-कन्या,सावित्री। माता-पिता ने नाम बस रख दिया, कोई नाम तो रखना ही था। एक वो सावित्री थीं, रूपसी, राजा की पुत्री, राज-कन्या, अपने जीवन के सारे निर्णय लेने के लिये स्वतन्त्र, जो मन को भा गया वही पतिरूप में सदा के लिये स्वीकार्य हो गया, क्षत्राणी थीं, साहस तो रक़्त में व्याप्त था। सबने मना किया कि सत्यवान से विवाह न करो पर राजकन्या के प्रेम के आगे किसकी चली है, यमराज को भी हार माननी पड़ी। पर मेरी सावित्री को तो प्रेम का अधिकार ही नहीं। बचपन बीत गया जवानी के इंतज़ार में और जवानी बीतती जा रही थी, ब्याह के इंतज़ार में। बूढ़े होते जा रहे माता-पिता दिन-रात यही सोचते कि किसी तरह यह कन्या भी हिल्ले लगे। गरीब की कन्या को सुंदर होने का भी अधिकार नहीं होता। मनचाहा वर तो किसी-किसी की तपस्या में होता होगा, सावित्री दिन-रात यही सोचती रहती। देने लायक दहेज़ जुटा सकें इसकी हैसियत तो माता-पिता चार बेटियों का ब्याह करके पहले ही चुका चुके थे, बस किसी तरह इसकी भी गाँठी जुड़े तो गङ्गा नहायें और सत्यनारायण का पाठ धरें।

ख़ैर, देर-अबेर ईश्वर ने उनकी सुन ही ली, एक बिचवानी ने एक रिश्ता बताया। शहर के एक बड़े धनवान ब्राह्मण हैं उन्होंने आपकी कन्या को एक विवाह समारोह में देखा था, उन्हें आपकी कन्या बहुत जँच गयी है, लेन-देन का कोई चक्कर नहीं, ईश्वर की कृपा से सारा घर भरा है, उन्हें कुछ नहीं चाहिये। यह सुनकर तो सावित्री के माता-पिता को तो मानों मुँह मांगी मुराद मिल गयी। फिर भी बिचवानी से पूछ ही लिया, कि ऐसा क्यूँ कि कुछ लेना-देना ही नहीं? बिचवानी बोले, दूसरा ब्याह है, पहली पत्नी इन्हें छोड़कर चली गयी, जीवन काटना कठिन जान पड़ा तो फिर से ब्याह की इच्छा जताये रहे, इसी से हम आपसे बात किये, लड़कियों की कोई कमी थोड़े ही होती है धनवान को। लड़की को सारी उमर बैठाये रखने का इरादा हो तो ना कर दो, कोई गरजू थोड़े ही हैं। इतना कह कर आग-बबूला होते हुये बिचवानी महाराज उठकर जाने लगे, तो सावित्री के पिता उनके पैरों पर गिर पड़े, महाराज हमसे भूल हो गयी जो आपसे सवाल-ज़वाब किये, आप तो हमारे हितैषी ही हैं, मेरी ही मति मारी गयी थी, क्षमा महाराज, क्षमा। अच्छा-अच्छा ठीक है, रहने दो ये सब, रिश्ता पक्का समझूँ फिर? जी महाराज, अवश्य, शुभस्य शीघ्रम। इसी जेठ में ब्याह कर देते हैं।

सावित्री, फिर खो गयी सपनों की दुनिया में? उधर से आती हुई सरिता ने चुटकी ली। ब्याह होगा, मैडम जी का, कार में मायके आयेंगी। सावित्री भी सोचती, कि काश हम-उम्र दूल्हा मिल जाता तो "तुम" करके बात करती, इस अधेड़ को तो सारी उमर "आप" कहना होगा। तीस की होने को आयी थी और ख़ुद को नवयौवना समझ, सपने भी कच्चे देखती थी।

जैसे-तैसे ब्याह निपटा, सारा ख़र्च लड़के वालों की तरफ़ से ही किया गया। नाते-रिश्तेदार सब विदा हुये और विदा होकर सावित्री अपने पति के साथ बंगले पर चली आयी। सावित्री के मन में एक प्रश्न मथता रहता, कि इनकी पहली पत्नी इन जैसे भले मानुष को छोड़ कर, अपना सारा सौभाग्य छोड़कर क्यूँ चली गयी? फिर सोचती कि, ये न हुआ होता तो मेरे भाग्य क्यूँकर खुलते, ख़ैर मुझे क्या, यह सोचते-सोचते नवविवाहिता का शृङ्गार करके, दर्पण में स्वरुप पर ही मुग्ध होती रहती। दिन इसी तरह बीतते गये और सच्चाई की अनगिनत परतें शनैः-शनैः खुलती गयीं। चार वर्ष होने को आये थे विवाह को पर सावित्री की गोद अभी तक सूनी थी। बाँझ के ताने सुन-सुन कर कान पक गये, बेचारी अपने मन की व्यथा किससे कहती। हारकर पति से एक बच्चा गोद लेने के लिये कहा, तो उसने सारी भलमनसाहत का आवरण उतार कर फेंका और एक झन्नाटेदार थप्पड़ सावित्री को रसीद दिया। तेरी हिम्मत कैसे हुई यह बात कहने की? हम ख़ानदानी लोग हैं, हम अपनी वंशबेल किराये के पौधों से नहीं बढ़ाते। सावित्री तो जैसे होश में आ गयी, अब तक जो देखा वो सब स्वप्न था? इस नपुंसक के सम्मान की रक्षा, अब तक क्यूँकर करती रही? मन में कुछ ठानकर आँसू पोछकर सावित्री मुस्कुरा उठी। सावित्री के भीतर एक पत्नी की हत्या हो गयी थी, बची थी तो बस एक औरत।

कुछ दिन बीते और सावित्री के पति ने सत्यार्थ कुमार को अपनी सहायता के लिये काम पर रख लिया और अन्य नौकरों के साथ उनके रहने की व्यवस्था कर दी।

सावित्री का शव विवाहिता के पूरे शृङ्गार के साथ रखा हुआ है, परिवार की सभी स्त्रियाँ सावित्री की चरणरज लेने को व्याकुल हैं। स्त्रियाँ आपस में बातें करती हैं, सती स्त्री थीं सावित्री बहन, जाने से पहले पति की वंशबेल बढ़ा कर ही गयीं, पास ही एक स्त्री की गोद में एक मनोहारी नवजात बालक आकाश को निहारने का असफ़ल प्रयास कर रहा है। यह सावित्री का पुत्र है, सावित्री इस बालक को जन्म देते ही सिधार गयी।

सावित्री के पति श्मशान घाट पर सोच में डूबे खड़े हैं, शून्य में निहारते हैं, बालक के लालन-पालन की चिंता उन्हें खाये जा रही है, तीसरा ब्याह कर लें क्या, सोचते हैं?

Thursday, May 14, 2015

दो अर्थव्यवस्थाओं की तुलना करके देखना चाहती हूँ (समाजशास्त्र का मेरा कोई अध्ययन नहीं है, अलबत्ता अर्थशास्त्र थोड़ा-बहुत, मतलब परास्नातक स्तर तक पढ़ा है, यह तुलना मेरे "ऑब्जरवेशन" पर आधारित है)

जापान में वर्तमान में दो समस्यायें मुँह फैलाये खड़ी हैं, पहली है, "नकारात्मक जनसँख्या वृद्धि", और दूसरी है, "वयोवृद्ध लोगों की संख्या कुल जनसँख्या की ४०% है"। लगभग हर दूसरा व्यक्ति इन समस्यायों पर चिंता जताता मिल जाता है। कुछ के अनुसार यह बहुत बड़ा ज़ुल्म है, कि कमाने वाली जनता उन लोगों का भी उत्तरदायित्व उठाये जो नहीं कमाते हैं। हाल ही में मेरी एक मित्र ने इसी प्रकार की बात की, तो मुझसे रहा नहीं गया, आख़िरकार मैंने उनका विरोध करते हुए कहा कि, जितने भी वयोवृद्ध लोग आपके यहाँ हैं, उन्होंने अपनी युवावस्था में आपकी अर्थव्यवस्था को सबल बनाने में अपना योगदान दिया है, कर(टैक्स) दिया है, साथ ही अपनी पेंशन के लिये भी स्वयं इंतज़ाम किया है, इसलिये आपकी यह चिंता स्वीकार्य नहीं है। जो पहली समस्या है, नकारात्मक जनसँख्या वृद्धि की, वो एक बड़ी चिंता है, क्योंकि जब भविष्य में काम करने वाले हाथों की आवश्यकता पड़ेगी तो उसका इंतज़ाम कैसे होगा? यहाँ जनसँख्या का माध्य (एवरेज) प्रति परिवार १ बच्चा आता है, उसके बहुत से कारण हैं, जिनमें से एक निःसंतान दम्पत्तियों की बहुत अधिक सँख्या भी है, तथा "दत्तक पुत्र/पुत्री" (एडॉप्शन) का विकल्प न के बराबर (शायद शून्य)।

भारत की स्थिति ठीक इसके विपरीत है। भारत में जनसँख्या वृद्धि अपनी सभी सीमाओं के पार जा चुकी है (भले ही हाल में वो रुक गयी है), तथा यह देश की अर्थव्यस्था को जितना नुकसान पहुँचा सकती थी, पहुँचा चुकी है। माल्थस तो अपने जनसँख्या के सिद्धांत में बता ही चुके हैं कि, "प्रकृति अपना बदला स्वयं ले लेती है", तो क्या आप वर्तमान समय में ऐसी किसी स्थिति की कल्पना या आकाँक्षा कर सकते हैं कि, "प्रकृति स्वयं अपना बदला ले?", कम से कम मैं तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं चाहूँगी कि ऐसा कुछ हो। जितनी तीव्रता से भारत की "युवावस्था" आयी है उतनी तीव्रता से रोज़गार उत्पन्न करने में हम असफल रहे हैं। लेकिन, रोज़गार हो या न हो विवाह सबका करा दिया जाता है। विवाह संस्था का मूल-आधार संतानोत्पत्ति एवं उसका पालन-पोषण है (सारी दुनिया में)। अब वर्तमान भारत में जो १८% का "कामगार"(वर्क-फ़ोर्स) है उसके ऊपर कितना बोझ है आपको इसका अंदाज़ा लगना शुरू हो गया होगा। शिशु, बालक, स्त्रियाँ तथा वृद्धजन (जो प्रकटरूप से अर्थव्यवस्था में अपना योगदान नहीं कर रहे हैं) सबके भरण-पोषण का भार, वर्तमान "कामगार"(कार्यरत जनता) पर है। आशा है कि आप एक विस्तृत चित्र देख पाये होंगे। समाधान और कौन सी योजनायें प्रभावी होंगी, यह मैं नहीं जानती, परंतु इतना तो तय है, कि भारत को अपनी सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा, तथा यह भी समझना होगा कि अभी भारत की सरकार इतनी सक्षम नहीं है कि वह "योगक्षेमं वहामि अहम्" कर सके।

Thursday, April 30, 2015

प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाई |
राजा प्रजा जिस रुचे, सीस देय ले जाई ||
Love is not grown in the field, and it isn’t sold in the market
But a king or a pauper who likes it, offers his head to obtain it
MEANING:
In the region of love there is no difference between king or pauper. Who wants to get love has to give up his ego, all other wealth has no value in love. Love is spiritual, not a material thing.

क्रोध पर विजय


मेरे विचार से क्रोध पर विजय प्राप्त करने के लिए क्रोध को जानना आवश्यक है| मेरा यह भी मानना है कि जो व्यक्ति हिंसा को नहीं जानता है वह हिंसा पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता है|

मानव मन की कई परतें व सतहें होती हैं जिनसे मानव स्वयं भी अनभिज्ञ व अपरिचित होता है अतः पूरे जीवनकाल में अहिंसक दिखने वाला व्यक्ति कब हिंसक रूप धारण कर ले यह कह सकना कठिन है| उसी प्रकार एक सदैव शांत दिखने वाला तथा शांत व अविचलित रहने वाला व्यक्ति जब जीवन के कमज़ोर क्षणों में क्रोधी व्यक्ति का आचरण करता है तो उसके परिजन भयभीत हो जाते हैं| किन्हीं विशेष परिस्थितियों में तो उसे झूठा व ढोंगी भी समझा जा सकता है| परंतु वास्तविकता कुछ और ही होती है| ऐसा व्यक्ति एक कमज़ोर, हारा हुआ, हताश और अज्ञानी प्राणी होता है, क्योंकि वह स्वयं अपने मूल स्वभाव से अपरिचित होता है|

अब प्रश्न यह उठता है कि वह अपने मूल स्वभाव से अपरिचित क्यों होता है? इसका उत्तर देना सरल कार्य नहीं है, कारण यह है कि किसी विशेष परिस्थिति में मनुष्य का व्यवहार बहुत सी बातों पर निर्भर करता है| स्वयं के मूल स्वभाव से अपरिचित होने के कारणों में बहुत बड़ा योगदान हमारे संस्कारों का है, और हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार मनुष्य अपने पूर्व-जन्म के संस्कारों को भी अपने साथ लाता है|

क्रोध का मूल कारण अज्ञान है, अतः क्रोध पर विजय पाने के लिए अपने मूल स्वभाव का ज्ञान तथा क्रोध की उत्पत्ति के कारणों का ज्ञान आवश्यक है| जब तक आप इन दोनों बातों का ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेते हैं तब तक न ही आप क्रोध पर विजय प्राप्त कर सकते हैं न ही आप सत्य का साक्षात्कार कर सकते हैं|

मानव जीवन का लक्ष्य सत्य से साक्षात्कार है, वही आनंद का स्रोत है, परंतु क्रोध पर विजय प्राप्त किए बिना इस आनंद की प्राप्ति संभव नहीं है| अतः, अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कीजिए और जीवन का आनंद लीजिए| - अनामिका

Self-image


I never knew I will be disturbed by my friends in Japan, when I am writing something, but this is a blessing indeed. [I was being disturbed twice while I was writing this piece, so there could be disconnections].
I have been reflecting on this topic: Self-image, for a long time and here are my findings. What is “Self-image”? As per my understanding, it is the summation of various reflections. The problem with us is, we cannot see ourselves, we can only see others, and therefore we make a perception of other human beings based on the information provided by our senses. There is one more factor that determines our perception about others, which is the state of mind. Therefore, we make a decision about other person’s image based on the information provided and also the state of mind at that point of time. Hence, we seems to be ready to judge the personality and actions of others. But, we find it very difficult to do the same for ourselves.
The first reception of our image is the imaginary “image”, which is reflected in the “Mirror”. Few researches say that we see a far better looking picture of ourselves than we actually are.
The second basis of information is the opinions of others. We often base our image on the opinions provided by the people around us. Sometimes they are family members, friends, teachers, colleagues, neighbors and strangers.
My interest is to know whether the image “formed”, based on the various information received from various sources, is “Real” or “Not-real”. The likely answer to this question is “Not-real”. Now the next question arises, if we know that the “Self-image” is not real, then why we carry it with us everywhere? Again, I get the same answer, because we do not know ourselves well enough, and we do not have the courage to be the “real”. Why we do not have the courage, because our “Ego” is vulnerable.
The made-up “Self-image” is the byproduct of our thoughts, and we are so much attached to our thoughts and convictions that we do not want to leave those even for a fraction of second, therefore we carry our “Made-up Self-image” with us everywhere.
Market-researchers have a very good idea of this “Imaginary or Made-up Self-image” and also the fragile nature of it, that they relate their products with the kind of image we have created for ourselves. Their objective is very clear, that is to sell the product or service.
There are numerous examples of human actions based on the “Self-image”. For example, the kind of cloths one wears, kind of language one speaks, kind of hobbies and possessions etc. The “Self-image” is not only related with the material possessions but the behavior of a person also is governed by this “Imaginary Self-image”. We cannot term it a “Hippocratic behavior” because it is not a conscious effort, rather it is so unconscious that we are unaware of it. One can mistake the “Imaginary Self-image” and “low self-esteem” to be interchangeable, but it is not the case. People with high self-esteem also have an “Imaginary Self-image”.
Now the concluding question here is: How can we decide if a “Self-image” is “fake” or “real”?
There is one and only one way to do it, and that is, to see oneself as we see others. The moment you will start seeing your own actions and thoughts as you see other’s, you will know if your “Imaginary Self-image” is “fake” or “real”. That is where you will find your answer….
सज्जनों के गुण:
१. जो लोग दूसरों की खुशी में वास्तव में खुश हों.
२. जो लोग हमेशा दूसरों के गाढ़े वक़्त में काम आएँ.
३. जो लोग दूसरों से सद्भाव व संवेदना रखें.
४. जो लोग अपने कृत्यों को नियंत्रण में रखें.
५. जो लोग दिल से प्यार करें, प्यार का दिखावा नहीं.

दुर्जनों के गुण:
१. वे लोग जो मन, वचन व कर्म से दूसरों को दुःख पहुँचाने का काम करें.
बस, दुष्ट लोगों की यही एक पहचान है, और इतना ही काफ़ी है, अच्छे लोगों में ऐसे अनगिनत गुण होते हैं, कि आप जब भी ऐसे लोगों से मिलते हैं आनंद की अनुभूति होती है, पर बुरे लोगों के बारे में और क्या कहूँ, आप सबका परिचय ऐसे लोगों से गाहे-बगाहे होता ही होगा, तब आप उन चन्द अच्छे लोगों को याद कर सकते हैं जो भले ही आपसे जीवन में एक बार ही मिले हों, लेकिन अभी तक आपके साथ हैं.....
मैं स्वयं "सामान्य वर्ग" (जोकि मध्य मार्ग अपनाता है) में आती हूँ.....
जगद् गुरु आदि शंकराचार्य जी की जयन्ती पर लिखा था .....

सत्संगत्वे निस्संगत्वं, निस्संगत्वे निर्मोहत्वम् |    
निर्मोहत्वे निश्चलतत्वं, निश्चलतत्वे जीवनमुक्तिः || (९)
- श्री शंकराचार्य

भावार्थ:  सत्य की संगत करने वाले व्यक्ति, सभी प्रकार के संग से छूट जाते हैं, फलतः उनकी दुविधा भंग हो जाती है, दुविधा भंग होने से वो निश्चयात्मक बुद्धि को प्राप्त होते हैं. यह निश्चयात्मक बुद्धि अंततः मुक्ति का मार्ग प्रदर्शित करती है|

Monday, April 20, 2015

(12) "समझ रह गयी कच्ची है"

शून्य में मिलकर शून्य हुये सब,
साथ आये दस गुना गये बढ़,
एक मिले एक और एक से,
मिलकर हो गए एक,
गणित तो हमारी पक्की है, 
पर समझ रह गयी कच्ची है.

विपरीत मिले से हो आकर्षण,
समान मिले विकर्षण,
गुण सही मिले तो युग्म बने,
नहीं तो होता घर्षण,
भौतिकी तो हमारी पक्की है,
पर समझ रह गयी कच्ची है.

जो चीज़ ज़रूरी है जीवन में,
वह मिले बहुत ही सस्ती,
पत्थर-मिट्टी बन जाते क़ीमती,
होती है उनकी हस्ती,
आर्थिकी तो हमारी पक्की है,
पर समझ रह गयी कच्ची है.

परिकल्पना बनी, मिले आंकड़े,
सिद्ध हुये सिद्धांत,
जीवन चले न कल्पना से,
चाहिए उसे स्वाभिमान,
सांख्यिकी तो हमारी पक्की है,
पर समझ रह गयी कच्ची है.

Sunday, April 19, 2015

(11) "पिता"

पिता बोता है सपने,
सुनहरे, रुपहले, सतरंगी, अनोखे,
रोज़,

पिता बढ़ता है वट सा,
छाया देता, पोषक, रक्षक,
रोज़,

पिता बदलता है सपने,
बच्चों के सपनों से,
रोज़,

पिता देता है उड़ान,
पंखों को, डोर जीवन की,
रोज़,

पिता मिटाता है रुकावट,
बनकर एक रुकावट,
रोज़,

पिता पी जाता है आँसू, विदा के
बसाकर बेटी को दिल में,
रोज़,

पिता सहता है पीड़ायें,
अनेक, प्रेम के बदले में,
रोज़,

पिता होता है इक बाग़बाँ,
देख कोंपलें ख़ुश होता है,
रोज़,

पिता चुकाता है क़ीमत,
ताक़तवर होने की,
रोज़,

पिता जिज्ञासा की कड़ी,
पहली, आधार ज्ञान का,
रोज़,

पिता खिलता है, बच्चों से,
मुस्कान से, खिलता है चेहरा जिसका,
रोज़,

पिता, पहला परिचय, संसार से,
वयस्क होने से पहले,
रोज़,

पिता साथ है, हमारे सदा,
हर रूप में, हर जगह,
रोज़.…

(हर संवेदनशील पिता को समर्पित)

Friday, April 17, 2015

(10) "बचपन"

वो सर्दियों की गुनगुनी धूप में,
ताज़े अमरूदों को निपटाना,

वो गर्मियों के थपेड़ों वाली लू में,
लगाकर नमक कच्चा आम खाना,

वो झमाझम बारिश में झूलना,
झूला, आम के पेड़ पर,

वो सूँघना नींबू के फूल काँटों के बीच,
मोगरे की कलियाँ लेकर घूम आना,

वो दनदनाते चलाना सायकिल,
ढ़लान पर, लुढ़कना चोट खाना,

वो घेर लेना बिल्लियों को,
लड़ाना कोयल से ज़ुबान,


वो मूंगफली सी बातें,
वो मुरमुरे से सपने,

वो चिढ़ाना छोटी बहन को,
खींचकर चोटी सबके सामने,

वो खेलना कोट-पीस,
करना नन्ही सी बेईमानी,


वो मम्मी से लिपट सो जाना,
थककर रात भर पढ़ने के बाद,

वो बेफ़िक्री के दिन और सुहानी शामें,
कोई ला दे, कहानियों वाली बचपन की रातें।

Thursday, April 16, 2015

(9) "हे चन्द्र"

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
अभागे हो या बड़भागी,
कातिक में पूजे जाते हो,
भादों में हो जाते कलंकी,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
सोलह कलाओं के स्वामी,
पूर्णिमा में चमकते हो,
फिर भी राहू के ग्रास,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
सच में एक चरखा है,
एक धोखा है बस, या,
गड्ढे हैं तुम्हारी आँखों के,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
प्रेम गीतों में तुम साक्षी,
कवियों के प्रिय,
फिर भी बदनाम,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
द्विविमीय लगते रोटी से,
त्रिविमीय गोले से,
क्या छुपाते हो दूसरी ओर,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
अनुसूया के पुत्र होकर भी,
कुछ सीखा नहीं माँ से,
बच्चों ने बना लिया,
खिलौना तुम्हें,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
क्या धरती से प्रेम है तुम्हें,
छिटकाकर फेंक दिए गये हो,
फिर भी रोज़ ताकते हो,
यूँही, दूर से,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
स्वयं का गुरुत्व नहीं कुछ,
ज्वार-भाटा लाते हो धरती पर,
क्यूँ चिपके हो,
क्या नहीं है स्वाभिमान,

हे चन्द्र,
पूछना है तुमसे,
होता है क्या पुनर्जन्म,
बना देना इक पिण्ड मुझे,
देखना है,
दूसरी ओर से तुम्हें।

Wednesday, April 8, 2015

(8) "माँ"

जाने कब, सुबह से शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

माँ बनकर ही जाना मैंने,
क्या-क्या तुमने देखा होगा,
क्या कष्ट सहे, क्या भोगा होगा,
सबकुछ चुपचाप सहा होगा,
सहते-सहते कब शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

तुम्हारी कापियों-किताबों को,
कितना मैंने गोचा होगा,
अधबुने उस स्वेटर को,
कितनी बार उधेड़ा होगा,
बुनते-बुनते फिर शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

आँखों के चमकीले तारे,
होंठों की प्यारी मुस्कान,
तेरी निश्छल हँसी,
गीतों की वो मीठी तान,
सुनते-सुनते फिर शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी

कठिन समय था नया दौर था,
ख़ुद को कितना ढ़ाला होगा,
हम दोनों को पाला होगा,
ख़ुद को कैसे सम्हाला होगा,
सोचते-सोचते कब शाम हो गयी,
पर माँ तुमसे पहचान हो गयी,

Tuesday, April 7, 2015

(7) "ज़िन्दगी"

ह्रदय की धड़कन है,
या नाड़ी का स्पंदन,
झरने की कल-कल है,
या नदी का गमन,

तपती हुई धूप है,
या शीतल मंद समीर,
सुमनों की सुगंध है,
या मगन मन-मंदिर,

वर्षा की बूँदें हैं,
या लहराते हुए खेत,
ममता की छाँव है,
या मरुभूमि की रेत,

शिशुओं का रुदन है,
या तरुणियों की हँसी,
वृद्धों का अनुभव है,
या युवाओं की रवानी,

मोह का एक पाश है,
या मुक्ति का स्फुटन,
संबन्धों की गर्माहट है,
या अकेलेपन की घुटन,

ज़िन्दगी तो एक है,
पूछने हैं प्रश्न,
क्यूँ आती है, क्यूँ जाती है,
क्यूँ करती है पर्यटन?

Monday, April 6, 2015

(6) "मैं और तुम"

मेरी अपेक्षा, तुम्हारी अपेक्षा,
मेरी संतान, तुम्हारी संतान,
क्या है मेरा, क्या है तेरा,
न मुझ बिन तुम हो,
न तुम बिन मैं हूँ,
फिर यह कैसा बँटवारा,

ये धरती तेरी, वो आकाश मेरा,
मेरी धानी चुनर, वो नीलाम्बर तेरा,

अनुत्तरित प्रश्न फिर भी रहा,
उपजता है किससे,
किसमें जाता है समा,
कैसा विलगन, यह कैसा मिलन,
है प्रेम या है आकर्षण,
है मया या है समर्पण,
तू ही मैं है, और तू ही अर्पण।
क्या तुम, तुम हो या हो मेरा दर्पण।

Saturday, April 4, 2015

(5) "सूर्य-प्रभा"

धुंध कहीं छँटने लगी है,
बर्फ़ कुछ पिघलने लगी है,
मौन हैं स्वर परन्तु लहर,
संगीत की बहने लगी है,

आकाश में सजी हुई है,
रक्तिम सूरज की बिंदिया,
झिलमिल जल की धारा है,
धरा रोशनी में नहाने लगी है,

स्वागत करो इस नयी प्रभा का,
इतिहास नया लिखने लगी है। 

Saturday, March 28, 2015

श्रीराम द्वारा स्थापित आदर्श:- (आप इनसे सहमत या असहमत होने के लिए स्वतंत्र हैं)

१. आदर्श पुत्र (माता-पिता के आदेश का अनुपालन किया)
२. आदर्श भाई (भाई के लिए राज-पाट त्याग दिया)
३. आदर्श शिष्य (महर्षि विश्वामित्र, वशिष्ठ एवं परशुराम का मान किया)
४. आदर्श पति (एक पत्नी विवाह की प्रथा की नींव डाली)
५. आदर्श नरेश (उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत के राज्य को आतताइयों से मुक्त कराया)
६. परम त्याग का आदर्श (प्राणों से प्रिय पत्नी का त्याग किया)
७. वनवासी जीवन का आदर्श (१४ वर्षों तक वनों में जीवन व्यतीत किया)
८. आदर्श राजनीतिज्ञ (परम शक्तिशाली आतताई रावण के संहार हेतु सही कूटनीति का प्रयोग किया)
९. आदर्श पर्यावरणविद (पशु-पक्षियों के प्रति उदारवादी दॄष्टिकोण)
१०. आदर्श नारीवादी (अहिल्या उद्धार)

१. शिक्षा नौकरी के लिए नहीं परन्तु आत्मविश्वास के लिए आवश्यक है, और जीविको-पार्जन की क्षमता भी उसी व्यक्ति में होती है जिसमें आत्मविश्वास होता है.
२. यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है कि पति-पत्नी दोनों नौैकरी करें। पति या पत्नी में से कौन क्या काम करे इसका निर्णय उन्हें ही करने दीजिये, परन्तु इसे बच्चों के संस्कार के जोड़ना उचित नहीं है.
३. इस बात की क्या गारंटी है कि जो महिला घर में रहती है (नौकरी नहीं करती) वो बच्चों को अच्छे संस्कार ही देगी ?
४. संस्कार देने की ज़िम्मेदारी अकेले स्त्री की ही क्यों हो ?
५. संस्कार बातों से नहीं दिए जा सकते, उसके लिए उदाहरण प्रस्तुत करने होते हैं.  
६. आने वाली पीढ़ी की बात जाने दीजिये, पिछली पीढ़ी ने सब उत्तम संतानें ही उत्पन्न की हैं? क्या कारण है कि आज पीढ़ी इतनी विचलित है ?

Saturday, March 21, 2015

सभ्यता की अत्यधिक उन्नति स्वतंत्रता को बाँध देती है, हर चीज़ के, हर बात के नियम-कायदे व मापदण्ड निर्धारित हो जाते हैं, परिणामस्वरूप उस सभ्यता का अंत सुनिश्चित हो जाता है. थोड़ी असभ्यता ही रहे तो ठीक है, बचे तो रहेंगे। जापानी सभ्यता वर्तमान में विश्व की उन्नत सभ्यताओं में गिनी जाती है, परन्तु "नकारात्मक जनसंख्या वृद्धि" वर्तमान में इनकी सबसे बड़ी चिंता है।
गुज़रे हुए वक़्त को याद न करना ही अच्छा,
मेहेरबानी-ए-वक़्त कि कुछ लोग मिले।।।

Friday, March 20, 2015

ज़िन्दगी "टाइम-टेबल(समय-सारिणी)" के साथ नहीं चलती, जब भी इसे इस प्रकार चलाना चाहो तो यह "फ्लेक्सिब्लिटी(लचीलेपन)" की दरकार करती है, मानो मुँह चिढ़ाते हुए कहती है बड़े आये मुझे "कंट्रोल (नियंत्रित)" करनेवाले, अक्सर इस नियंत्रण की चाह में हम तनावग्रस्त जाते हैं (नियंत्रित न कर पाने के कारण). खुद पर मुस्कुरा कर देखिये अपने आप कंट्रोल होती है, ट्राई कीजिए. [कल से मोबाइल में अपने एक-एक घंटे का टाइम-टेबल दिया, अब वो हर घंटे रिमाइंडर दे रहा है,  और मैं मुस्कुरा रही हूँ]
यहाँ जापान में मेरी हालत पीके मूवी के पीके जैसी ही रहती है, पीके सुन तो सब लेता है पर रिस्पॉन्ड नहीं कर पाता है, क्यूंकि वह भाषा नहीं जानता, जिसका भी हाथ पकड़ लेता है उसका माइन्ड रीड कर लेता है (अपन को भी वही जुगाड़ लगाना पड़ता है, वाक्य में से शब्द चुनकर पॉसिबल अर्थ बनाओ, पर डर रहता है कि अर्थ का अनर्थ न हो जाए), आज अपनी टीचर के साथ "गार्डनिंग" की क्लास में गयी थी, न मेरी टीचर को अंग्रेज़ी आती है न ही गार्डनिंग सिखाने वाली मैडम को, सब कुछ जापानी में चल रहा था. तारीफ़ वाले कुछ शब्दों का अर्थ मुझे पता है, तो काम खत्म होने के बाद ये तो पता चल गया कि काम अच्छे से हुआ, क्यूंकि तारीफ़ हुई. जापानी लोग ईमानदार होते हैं, तो ये माना जा सकता है कि तारीफ़ भी झूठी नहीं होगी.

मेरी टीचर की बेटी भी मेरी ही उम्र की हैं, एक स्कूल में अंग्रेज़ी पढ़ाती हैं, काफी अच्छी अंग्रेज़ी बोलती हैं (ऑस्ट्रेलिया में २ साल रहकर सीख आई हैं) उनसे मिलकर काफी अच्छा लगा, वरना तो हमलोग जापानियों के लिए दूसरे "गोले" के प्राणी हैं. विदेशियों को यहां "गईजिन" अर्थात "एलियन" के नाम से ही जाना जाता है.

Wednesday, March 18, 2015

God Connection

भगवान जी जब कनेक्ट करने के मूड में आते होंगे तो जो-जो ऑनलाइन होंगे उन्हीं से कनेक्ट करेंगे ना, इसलिए ऑनलाइन रहना बहुत ज़रूरी है, नेटवर्क कनेक्शन भी बढ़िया होना चाहिए, ऑफलाइन मैसेज, इनबॉक्स का सिस्टम वहाँ नहीं है, बैटरी भी चार्ज रहनी चाहिए नहीं तो गए समझो (पीके इफेक्ट)

Monday, March 16, 2015

(4) "जीवन-चक्र"

ये महल, दुमहले, चौबारे,
जाना है हाथ पसारे,
फिर आ जाना जननी जठरे,
चिल्लाना देख नज़ारे,

जीवन-चक्र चले ऐसे ही,
समझे या मौज मना ले,
मन के भावों पर परदा,
पहने या रहे उघारे,

अपने मन का मालिक बन,
मन-माफिक काम करा ले,
परपीड़ा को जाने,
औरों के दुःख निवारे,

जीवन वही, समर्पित हो जो,
मानवता की सेवा में,
एक मुक्ति का मार्ग वही,
ना भेद करे जो लोगों में। 

Sunday, March 15, 2015

विपरीत

मधुर वचन है औषधि, कटु वचन है तीर,
श्रवण द्वार ह्वये संचरै, सालै सकल शरीर,

हम ग़मज़दा हैं, लायें कहाँ से ख़ुशी के गीत,
देंगे वही, जो पाएंगे इस ज़िन्दगी से हम

तुम मेरे साथ जो रोये, तो है दोस्ती के जानिब,
तुम मेरी बात पे रो दो, ये मुझे क़ुबूल नहीं।

Friday, March 13, 2015

खूबसूरत रिश्ते

बात उन दिनों की है जब मेरा बेटा ४ महीने का था. पतिदेव तब कनाडा में परास्नातक की पढ़ाई के लिए गए हुए थे और मैं अपने बेटे के साथ अपनी ससुराल रायबरेली में थी. १४ नवम्बर २००४ को बेटे के अन्नप्राशन का मुहूर्त निकला, लेकिन ये क्या, ये तो दीपावली के बाद "भाई-दूज' के त्योहार का दिन था, मेरे माता-पिता मेरे भाई के घर मुंबई गए हुए थे. अब, मुहूर्त तो मुहूर्त, ये न तो बार-बार आते हैं, न बदले जाते हैं, किसी की भावनाओं का इनसे क्या लेना देना।

खैर, सारी तैयारी हुई, मेहमानों से घर भर गया, सभी तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ। लेकिन, एक इंसान तो कहीं न कहीं बहुत अकेला था, पर उससे क्या, मुहूर्त तो फिर मुहूर्त होते हैं. उसी प्रकार बहुत कुछ बस होता है.

दिन गुज़र गया "सत्यनारायण की कथा" में, शाम हुई तब तक मेहमानों का आना लगा रहा, पर एक इंसान को किसी के आने की कोई उम्मीद नहीं थी, कौन आएगा, कानपुर कोई इतना पास भी नहीं है.

अचानक, अपने सामने चाचा-चाची, भाई-बहनों को देख कर मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि ये सच है या सपना. शायद मैं इतने बड़े आश्चर्य के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थी, उस दिन, मुझे सच में पता चला कि एक परिवार का क्या अर्थ होता है. परिवार सिर्फ दुःख में साथ निभाने के लिए ही ज़रूरी नहीं है, सुख में भी उसकी उतनी ही ज़रुरत होती है.

मेरे मन के भावों को उतनी दूर रह कर भी समझ सकने वाले मेरे चाचा जी श्री विनय कुमार दीक्षित आज इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनकी ये बहुमूल्य याद मेरे साथ सारी उम्र रहेगी. कुछ लोग कम बातें करते हैं, पर वो जितना समझ लेते हैं उतना कोई नहीं समझ सकता, क्योंकि वो बोलते कम हैं पर सुनते कहीं ज्यादा हैं.

मन की इस बात और याद को आप सब के साथ इसलिए साझा कर रही हूँ क्योंकि बहुत बार हमारा अपने नज़दीकी रिश्तों पर से विश्वास उठ जाता है, शायद इस बात से कोई दूसरी दृष्टि मिले आपको.

Monday, March 9, 2015

(3) "स्त्रियॉं"

स्त्रियाँ जन्म लेती हैं पर मरती नहीं,
वो जीती हैं, हर जगह,
रोशनी की तरह, हँसी की तरह,
ख़ुशी की तरह, ज़िन्दगी की तरह,
समय की तरह, खूबसूरती की तरह,
अनुसूया की तरह, अहिल्या की तरह,
सीता की तरह, सावित्री की तरह,
द्रौपदी की तरह, सती की तरह,

सहती हैं वेदना, पीड़ा और अपमान,
मुस्कुरा देती हैं फिर भी, भुला कर,
फिर वही सुबह, फिर वही दिन,
फिर वही जीवन, फिर वही आलोड़न,

छली जाती हैं, युगों-युगों तक,
फिर भी मरती नहीं,
वो चेतना हैं, अनन्त हैं, सर्व हैं,
व्याप्त हैं, सर्वत्र हैं,
वो नहीं हैं, तो जीवन नहीं,
भाव नहीं, भोजन नहीं,

पूजन करो करुणामयरूप का,
कालरूपिणी भी स्त्री है,
विस्मृत नहीं होता है कुछ भी,
चेतन में रहता साकार,
मत करो चेतना का अपमान,
यह काल-चक्र है, आता वहीं पुनः है,
चल दिया था जहाँ से एक दिन.

Friday, March 6, 2015

भारत के त्योहार

आज आधुनिकता की चकाचौंध में हम अपनी भारतीय संस्कृति की एक अमूल्य देन को भुला बैठे हैं. वो अमूल्य देन है भारत के विभिन्न प्रांतों में मनाये जाने वाले त्योहार. पूर्व से लेकर पश्चिम तक, किसी भी सभ्यता में इतने त्योहार नहीं मनाये जाते हैं जितने कि भारत में, आखिर इसका कोई तो विशेष कारण होगा, जो हमारे पूर्वजों ने इन त्योहारों को मनाने की नींव डाली।

मैं उत्तर-भारतीय हूँ अतः उत्तर-भारत में मनाये जाने वाले त्योहारों की बात ठीक से कर सकती हूँ, बाकी भारत के बारे में आप स्वयं अपने क्षेत्र के अनुसार विचार कर सकते हैं.

इन्हें मनाने के कई उद्देश्यों में से मुख्य उद्देश्य मुझे यही लगता है कि, संगठन की भावना को बल प्रदान करने के लिए ही इनकी स्थापना की गयी थी. मानव के दिन-प्रतिदिन के जीवन में धीरे-धीरे नीरसता अपना घर बनाने लगती है और धीरे-धीरे ये व्यक्तिगत एवं सामाजिक संबंधों पर भी हावी होने लगती है. भाई-बहनों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों आदि से परस्पर भेंट के अवसर कम होते जाते हैं और हम उदासीन होकर ये सोचते हैं कि किसी को हमारी चिंता और आवश्यकता ही नहीं है, पर ये नहीं सोचते हैं कि दूसरा व्यक्ति भी ऐसा ही सोचता होगा. अंततः संबंधों की नींव दुर्बल हो जाती है, अकेलापन हावी होता है और हमें सारे समाज से समस्या हो जाती है. इस पूरी प्रक्रिया में हमें कभी भी खुद से समस्या नहीं होती है बल्कि दूसरों से होती है.

ये त्योहार हमें बाध्य कर देते हैं कि हम अपनी इस अदृश्य परिधि से बाहर जाकर लोगों से मिले-जुलें, उनके दुःख-सुख बाटें और कुछ नहीं तो कम-से-कम "देख-सुन" आयें. क्या हम अपनों के लिए इतना भी नहीं कर सकते? यदि, अपनों के लिए इतना भी नहीं कर सकते तो फिर दूसरों के लिए करेंगे, इसकी क्या अपेक्षा की जा सकती है?

बस एक अंतिम प्रश्न, आपको अपने जीवन में कितने लोगों की चिंता है ? यदि है, तो इस अवसर का लाभ उठाइये और अपने-अपनों से बात कीजिये, दूसरों से भी बात कर सकते हैं.

यदि आपने इस लेख को अब-तक पढ़ा है तो यही सोच रहे हैं कि, अभी तक किसी त्योहार का नाम नहीं लिया, मित्रों, आज होली है और मैं अपने घर-परिवार से हज़ारों किलोमीटर दूर हूँ, पर बहुत से लोग हैं जो अपने परिवार के पास होकर भी पास नहीं हैं, बस उन्हीं से मेरा नम्र निवेदन है कि, अपने परिवारीजनों के साथ समय बिताइये, सुख हो या दुःख मिलकर बाँट लीजिये, एक प्रयास कीजिए.

Wednesday, March 4, 2015

(2) "भारत की स्त्री-चेतना"

ओ भारत की स्त्री चेतना,
क्यूँकर रक्त-बीज उगाये,
शील हरे वो निर्भया का,
शीश फिर भी न झुकाये,

रक्त-मांस-मज्जा और दुग्ध से,
पोषित करके पाला जिनको,
वही नोचते देह मात की,
लज्जा न आती किंचित उनको,

जब-तक चेतना नहीं जगाओगी,
चिता यूँ ही जलाओगी,
उठ जाग जाओ अब रैन नहीं,
अब नहीं तुम शुक्र मनाओगी

Saturday, February 28, 2015

जब शरीर साथ छोड़ रहा हो और आप अपनी पीड़ा किसी भी भाषा में व्यक्त न कर सकते हों तो सारा व्याकरण का ज्ञान व्यर्थ है, आज मैं इस सच को हृदय में महसूस कर रही हूँ, मेरे इस सच का ज्ञान कब तक मेरा साथ देगा ये नहीं जानती, परन्तु इसी सच को अनुभव कर रही हूँ अभी (मैं पूरी तरह स्वस्थ हूँ, पर फिर भी यह अनुभूति कष्टकर है )

Friday, February 27, 2015

(1) "भारतीय समाज"

भारतीय समाज की, बस एक ही पहचान,
लड़की हो सुन्दर, और लड़का बुद्धिमान,
हुआ जो इसका उल्टा, समझो आफत महान,

लड़की नहीं है रूपसी, ईश्वर ने दिया ज्ञान,
पर, क्या करेगी पढ़-लिख कर गणित और विज्ञान,
बनाना तो उसे खाना है चाहें रोटी हो या नान,

माता-पिता की बस चिंता यही,
कैसे होगी शादी लड़की की, और कैसे करेगा लड़का काम,

लड़का जी हैं रूपधनी पर पढ़ने से मजबूर,
माता-पिता देखें कैसे, अपने सपने होते चूर,
अपने सपने होते चूर न देखे जाते,
किसी न किसी कालेज में जरूर दाख़िला करवाते,

आगे की कहानी अब हम अपने मुँह से क्या बतलायें ,
आप सब हैं समझदार, इशारों से काम चलायें,

भारतीय समाज की, बस एक ही पहचान,
लड़की हो सुन्दर, और लड़का बुद्धिमान…………

Tuesday, February 24, 2015

धन-सम्पदा

अक्सर हम ये सोचते हैं कि हमारे पास फलाँ चीज़ की कमी है |  ऐसा तब अधिक होता है जब हम भविष्य या भूतकाल के बारे में सोच रहे होते हैं, ऐसा तब भी होता है जब हम अपनी परिस्थिति की तुलना किसी दूसरे से करते हैं | पर क्या आपने कभी लिस्ट बनाई है कि आपके पास क्या-क्या धन-सम्पदा है..... आइये देखते हैं कि निम्नलिखित धन में से आपके पास क्या-क्या है:-

१. दिन-रात धड़कने वाला दिल.
२. सोच-समझकर काम करने वाला दिमाग.
३. सुंदरता को समेट सकने वाली आँखें.
४. परिश्रम कर सकने वाली दो भुजायें.
५. साहित्य रच सकने वाले दो हाथ
६. स्वाद का आनंद ले सकने वाली जीभ
७. गायन कर सकने वाली वाणी.
८. स्वर का ज्ञान करा सकने वाले कान.
९. जहाँ चाहें वहां ले जाने वाले कदम.
१०. सारे संसार का दर्शन करा सकने वाली पुस्तकें.
११. सृजन कर सकने वाला मन.
१२. मन को सुखी करने वाले मित्र.
१३. सदैव शुभेक्षु माता-पिता
१४. धर्य.
१५. संकल्प
१६. लगन
१७. प्रशक्ति
१८. स्वतंत्रता
१९. विश्वास
२०. आत्मविश्वास
२१. आत्मनिर्भरता
२२. जीवनसाथी
२३. संतान
२४. गुरुजनों का आशीर्वाद
२५. ईश्वर की कृपा
२६. संवेदना
२७. दान देने की इच्छा एवं क्षमता
२८. जिज्ञासा
२९. सहायता करने की तत्परता
३०. कार्य-कुशलता

Monday, February 23, 2015

अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम |
तत्पदं दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरुवै नमः ||

अर्थ : खण्डित न हो सकने वाले, संपूर्ण संसाररूपी, प्रत्येक चर व अचर में व्याप्त, ऐसे ईश्वर के दर्शन कराने वाले गुरु को मैं नमन करता हूँ |

आज-कल ये श्लोक " चक्रवर्ती सम्राट अशोक" नाम से प्रसिद्ध सीरियल में सुनाई देता है, आज मेरे पुत्र जी ने मुझसे इसका अर्थ पूछा, यदि मेरे द्वारा किये हुए अनुवाद में कोई त्रुटि हो तो कृपया सूचित करें |

"मातृभाषा दिवस" 21 फरवरी 2015 के उपलक्ष में यह पोस्ट हिंदी में.……

Wednesday, February 18, 2015

रूद्राष्टक (महाशिवरात्रि २०१५ )

नमामीशमीशान निर्वाण रूपं | विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ||
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं | चिदाकाशमाकाशवासं भजेहं || 
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं | गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशं ||
करालं महाकाल कालं कृपालं | गुणागार संसारपारं नतोहं ||
तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं | मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरं |
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा | लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा ||
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं | प्रसन्नानं नीलकण्ठं दयालं ||
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं | प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ||
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं | अखण्डं अजंभानुकोटिप्रकाशम् ||
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं | भजेहं भवानीपतिं भावगम्यं ||
कालातीत कल्याण कल्पांतकारी | सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ||
चिदानंद सन्दोह मोहापहारी | प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ||
न यावद उमानाथ पादारविन्दं | भजंतीह लोके परे वा नराणाम् ||
न तावत्सुखं शांति सन्तापनाशं | प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ||
न जानामि योगं जपं नैव पूजाम् | नतोहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ||
जरा जन्मदुःखौघ तातप्यमानं | प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ||
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेणाहरतोषये |
ये पठंति नरा भक्त्या तेषां शंभु प्रसीदति ||

Monday, February 16, 2015

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजमन, हरण भवभय दारुणं |

नवकंज लोचन कंजमुख, करकंज पदकंजारुणं ||


कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनीलनीरद सुन्दरं |

पटपीत मानहु तड़ित रुचि-शुचि, नौमि जनक सुतावरं ||

भजु दीनबंधु दिनेश, दानव दैत्यवंश निकंदनं |

रघुनंद आंनदकंद, कोशलचंद दशरथनंदनं ||

सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु, उदारु अंग विभूषणं |

आजानुभुज शर चाप धर, संग्राम जित खर-दूषणं ||

इति वदित तुलसीदास, शंकरशेषमुनिमनरंजनं |

मम हृदय कुंज निवास कुरु, कामादि खल-दल गंजनं |

मनु जाहि राचेउ मिलिह, सो बरु सहज सुंदर साँवरो |

करुणानिधान सुजान शीलु, सनेहु जानत रावरो ||

एही भाँति गौरी असीस सुनि, सिय सहित हियँ हर्षितअली |

तुलसी भवानिहि पूजि पुनि-पुनि, मुदित मन-मंदिर चलीं ||

"जानि गौरी अनुकूल सिय, हिय हरषु न जाहि कही |
मंजुल-मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे ||"